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अदालतें बंद कर दो?… दूल्हा हत्याकांड में बहन की ‘एनकाउंटर जस्टिस’ की जिद पर सवाल

डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी / जौनपुर

1 मई 2026 को बारात ले जाते समय 27 वर्षीय दूल्हे आजाद बिंद की सरेआम गोली मारकर हत्या ने पूरे प्रदेश को हिला दिया था। दुल्हन के ममेरे भाई प्रदीप बिंद ने शादी से नाखुश होकर अपने साथियों के साथ वारदात को अंजाम दिया। पुलिस ने मुख्य आरोपी रवि यादव को एनकाउंटर में मार गिराया।
मृतक की बहन सौम्या बिंद पिछले 9 दिन से कलेक्ट्रेट परिसर में धरने पर बैठी है। उसकी मांग है- ‘सभी आरोपियों का फुल एनकाउंटर हो’। यह मांग सीधे संविधान और विधि के शासन को चुनौती दे रही है।
पुलिस की कार्रवाई तेज है। मुख्य आरोपियों को शरण देने और फरार कराने में मदद करने वाले 6 आरोपियों को नौली गांव से गिरफ्तार किया गया। अन्य सहयोगियों समेत कुल 13 से अधिक लोगों को जेल भेजा जा चुका है। विवेचना अंतिम दौर में है, चार्जशीट तैयार हो रही है। कानून अपना काम कर रहा है।
ऐसे में ‘फुल एनकाउंटर’ की जिद न्यायिक प्रक्रिया का गला घोंटने जैसी है। संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के तहत ही दंड की गारंटी देता है। पुलिस को एनकाउंटर का अधिकार सिर्फ आत्मरक्षा में है। सुप्रीम कोर्ट ने PUCL बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र में हर मुठभेड़ की मजिस्ट्रियल जांच अनिवार्य की है। सड़क पर फैसला सुनाना ‘भीड़तंत्र’ होगा, लोकतंत्र नहीं।
चौंकाने वाला पहलू यह भी है कि मृतक आजाद बिंद का एक वीडियो सामने आया है जिसमें वह अवैध असलहे से फायरिंग करता दिख रहा है। यानी मृतक की खुद आपराधिक पृष्ठभूमि रही है। हत्या किसी की भी जायज नहीं, पर केस को ‘एकतरफा पीड़ित’ की कहानी बनाना तथ्यों से आंख मूंदना है।
इधर विपक्षी और जातिवादी पार्टियां इस लाश पर सियासी रोटियां सेंकने में जुट गई हैं। कोई इसे जातीय उत्पीड़न बता रहा है, कोई सरकार को घेर रहा है। सवाल है कि जब 13 आरोपी जेल में हैं, मुख्य आरोपी मारा जा चुका, तो ‘एनकाउंटर’ की मांग के पीछे मंशा क्या है-इंसाफ या दबाव की राजनीति?
इस बीच जिला प्रशासन ने सौम्या बिंद की सुरक्षा को देखते हुए उसे शस्त्र लाइसेंस देने की कार्यवाही शुरू कर दी है। खुफिया रिपोर्ट के बाद लाइसेंस जारी किया जाएगा। प्रशासन का कहना है कि जान-माल की सुरक्षा राज्य का दायित्व है, पर न्याय का रास्ता अदालत से ही निकलेगा।
सौम्या का दर्द जायज है। भाई खोने का दुख शब्दों से परे है। पर लोकतंत्र भीड़ के नारे से नहीं, कानून की किताब से चलता है। अगर हर पीड़ित परिवार ‘एनकाउंटर’ की जिद करेगा तो कल अदालतों पर ताला लगाना पड़ेगा।
इंसाफ चाहिए, बदला नहीं। और इंसाफ का एक ही रास्ता है-फास्ट ट्रैक ट्रायल, सख्त सजा, कानून के दायरे में। पुलिस ने अपना काम किया, अब अदालत को करने दीजिए।

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