मुख्यपृष्ठनए समाचारमोहर्रम की 11वीं तारीख को निकला 'लुटे हुए काफिले' का जुलूस

मोहर्रम की 11वीं तारीख को निकला ‘लुटे हुए काफिले’ का जुलूस

उमेश गुप्ता / वाराणसी

वाराणसी में मोहर्रम की 11वीं तारीख पर शनिवार को परंपरागत ‘लुटे हुए काफिले’ का जुलूस निकाला गया। दालमंडी स्थित इमामबाड़ा हकीम साहब (डॉ. नाजिम जाफरी के आवास) से निकला यह जुलूस कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना की याद में निकाला जाता है, जब इमाम हुसैन और उनके परिवार के बचे हुए लोगों को कैदी बनाकर कर्बला से शाम (सीरिया) ले जाया गया था।
कर्बला में इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों को तीन दिन तक भूखा-प्यासा रखने के बाद शहीद कर दिया गया था। मोहर्रम की 10वीं तारीख की रात उनके खैमे (टेंट) जला दिए गए थे, जिसके बाद महिलाएं, बच्चे और इमाम हुसैन के बीमार बेटे गर्म रेत पर पूरी रात रहे। 11 मोहर्रम की सुबह सभी को कैदी बनाकर कर्बला से शाम ले जाया गया था।
इसी घटना की स्मृति में निकाले जाने वाले इस जुलूस को ‘चुप के डंके का जुलूस’ भी कहा जाता है। जुलूस में सबसे आगे ऊंट पर डंका और अलम रहता है, जो लुटे हुए काफिले के आने का प्रतीक माना जाता है। पहले यह डंका हाथी पर निकाला जाता था। इसके पीछे अलम, बीच में मर्सियाख्वानी और सबसे पीछे दुलदुल चलता है। इस जुलूस की खास बात यह है कि इसमें नौहाख्वानी और मातम नहीं किया जाता।
मुज्तबा जाफरी व डा. मुर्तजा जाफरी के संयोजन में निकले जुलूस में कर्बला के शहीदों का लुटा हुआ काफिला नई सड़क, फाटक शेख सलीम, पितरकुंडा, लल्लापुरा होकर होकर दरगाहे फातमान पहुंचा। आयोजन में प्रोफेसर अजीज हैदर, रेहान बनारसी, अतहर बनारसी, समर बनारसी,शकील जादुगार, अब्बास मुर्तजा शम्सी, समर शिवालवी, सै. हैदर मेहंदी, सैफ जाफरी, सिराज आदि कलाम पढ़ते हुए चल रहे थे।

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