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कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर विशेष : कुशा की उत्पत्ति भगवान विष्णु के रोम से हुई है-नवीन चंद्र मिश्र,”वैदिक “गया जी धाम

अनिल मिश्र / पटना

सनातन धर्म में वैसा कोई स्थान नहीं जहाॅं दर्भ (कुशा) की उपस्थिति नहीं हो। कुशा की उत्पत्ति श्री विष्णु भगवान के रोम से हुई है ऐसा बताया गया। श्राद्धीय कर्मकांड या याज्ञिक सभी जगह कुशा का समान अधिकार है। ॐ कुशाग्रे वसते रूद्रकुशमध्ये तु केशवः ।कुशमूले वसेद् ब्रह्मा कुशान् मे देहि मेदिनी। कुशा के जड़ भाग में ब्रह्मा मध्य में विष्णु और अग्र भाग में शंकर भगवान रहते हैं। कुशा को बार-बार प्रयोग करने पर भी अशुद्ध नहीं होता है परंतु पिंड के संपर्क में आने वाला कुशा निर्माल्य हो जाता है। ” ॐ हूॅं फट्” मंत्र बोलकर भाद्रपद अमावस्या (कुशोत्पाटिनी अमावस्या) को उखाड़ने का विधान है तो यहाॅं पर स्पष्ट कर देना उचित होगा कि प्रत्येक दिन का कुशा उसी दिन तक शुद्ध रहता है। पूर्णिमा का पन्द्रह दिन अमावस का एक मास तक शुद्ध रहता है भाद्रपद अमावस्या को उखाड़ा कुशा वर्ष प्रर्यन्त अगर सोमवती अमावस्या होतो छः वर्ष और भौमवती अमावस्या का उखाड़ा कुशा वारह वर्ष तक शुद्ध रहता है। इस बार सोमवती अमावस्या होना दुर्लभ संयोग है। नवग्रहों में केतुकी समिघा कुशा है। ऋषि महर्षि या गृहस्थ साधना के लिए आसन में कुशे की चटईया प्रयोग करते हैं। सत्य में कुशा तो कुशा है। इस दिन नए कुशा के पवित्र ( अंगुठी) मोटक बना पितृ तर्पण विशेष महत्व रखता है क्योंकि कुशा उखाड़ने ही पितृगण आशान्वित हो जाते हैं। अंतः जिनको पितृ दोष है उन्हें श्रद्धा पूर्वक पितरों को तर्पण श्राद्ध करनी चाहिए। जो जातक शनि की अंतर्दशा, महादशा, साढ़ेसाती या ढैया से प्रभावित हो उन्हें काले सामग्री के साथ-साथ ऊनी वस्त्र या कंबल दान करनी चाहिए। कुशोत्पाटिनी अमावस्या मध्यान व्यापिनी १० सितंबर २०२६ ,१० बजे के बाद से है।

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