मुख्यपृष्ठस्तंभविशेष : बरगी बांध हादसा ... पर्यटक जान गंवाने नहीं आए थे

विशेष : बरगी बांध हादसा … पर्यटक जान गंवाने नहीं आए थे

विजयशंकर चतुर्वेदी
बरगी बांध, नर्मदा में डूबा क्रूज कोई हादसा नहीं। यह मध्य प्रदेश सरकार, मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम, जबलपुर जिला प्रशासन और क्रूज संचालक की मिलीभगत से हुआ एक टाला जा सकने वाला प्रशासनिक अपराध है।
हालांकि, हादसे के ठीक बाद से अब तक जी-जान लगाकर बचाव कार्य में जुटे अधिकारियों और कर्मियों की मैं सराहना करता हूं। लेकिन हास्यास्पद यह है कि कुछ संबंधित अधिकारी इस क्रूज को कभी न डूब सकने वाला शाहकार बता रहे हैं। ‘टाइटैनिक’ के बारे में किए गए दावे याद आ जाना स्वाभाविक है। विशाल बांध वेâ अंदर खमरिया टापू के पास ३० अप्रैल की शाम करीब साढ़े पांच बजे २० साल पुराना डीजल से चलनेवाला यांत्रिक क्रूज डूब गया, जिसमें दर्जनों लोग सवार थे। कई लोगों की मौत हो चुकी है, कई जिंदगियां बिखर गईं और यह सब उस सिस्टम के कारण हुआ, जिसने नियमों और आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाईं।
२०२३ में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने साफ आदेश दिया था कि नर्मदा जैसे पेयजल स्रोतों में डीजल या मोटर चालित क्रूज नहीं चल सकते। मार्च २०२४ में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश को सही ठहराया। इसके बावजूद मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम प्रतिबंधित, २० साल पुराना डीजल क्रूज चलाता रहा। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, अदालत के आदेशों की खुली अवमानना है। अगर अधिकारियों को यह आदेश पता नहीं था तो वे एक क्षण के लिए भी अपने पद पर बने रहने लायक नहीं हैं। मौसम विभाग ने हादसे के एक दिन पहले ४०–५० किमी प्रति घंटे की रफ्तार से आंधी चलने का येलो अलर्ट भी जारी किया था। इसके बावजूद शाम ४:३० बजे क्रूज को पानी में उतारना लोगों को जान-बूझकर खतरे में धकेलना माना जाएगा। जब क्रूज डूबा तो वह करीब २० मीटर गहरे पानी में फंस गया, कई शव निकालने के लिए क्रूज को काटना पड़ा और सबसे शर्मनाक यह कि यात्रियों को लाइफ जैकेट तक नहीं दी गई थीं; जब पानी भरने लगा तब जैकेट निकाली गईं और अफरा-तफरी मच गई।

यह रुटीन क्रूज संचालन की बेपरवाही और अमानवीयता का सबूत है। अब वही पुराना खेल शुरू हो चुका है—दर्दनाक तस्वीरें, रोती हुई मांएं, बिखरे परिवारष्ठ ताकि जनता का गुस्सा सिस्टम से हटकर भावनाओं में उलझ जाए। लेकिन यह मामला भावनाओं से दबनेवाला नहीं है। यह स्पष्ट आपराधिक जिम्मेदारी का मामला है।
इसलिए अब सिर्फ मुआवजा या औपचारिक जांच नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए। इस पूरे मामले में संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार लोगों पर तुरंत एफआईआर दर्ज होनी चाहिए, गिरफ्तारियां होनी चाहिए और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराई जानी चाहिए। जब तक सीधे नाम लेकर ऊपर से नीचे तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक यह सिलसिला नहीं रुकेगा।
यह पहली बार नहीं है, जब लापरवाही ने जान ली है और अगर इस बार भी इसे ‘जांच’ और ‘मुआवजे’ की फाइलों में दफना दिया गया तो फिर वही होगा—कुछ दिन शोर, फिर खामोशी और फिर वही क्रूज, वही सिस्टम, वही खतरा। लोग बदस्तूर सैर के लिए जाएंगे और सिस्टम दोबारा उन्हें मौत के मुहाने पर खड़ा कर देगा।
बरगी की यह त्रासदी याद रखी जानी चाहिए, क्योंकि अगर इसे भुला दिया गया तो अगली खबर सिर्फ जगह बदलकर जल्द आएगी।

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