-भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जिस दूसरे देश की भूमिका सबसे सकारात्मक रही वह जापान है, जिसने समाधि स्थलों के रूप में क्रांतिनायकों नेताजी सुभाषचंद्र बोस और रासबिहारी बोस की यादों को सुरक्षित रखा है। टोक्यो के इन तीर्थस्थलों को नमन किए बिना जापान की कोई भी यात्रा पूर्ण नहीं होती।
विमान से उतरकर जापान की धरती पर कदम रखते हुए किसने सोचा था कि यह यात्रा नेताजी सुभाषचंद्र बोस और रासबिहारी बोस के समाधि स्थल पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने से शुरू होगी। संयोग ही था कि टोक्यो यात्रा के पहले ही दिन मुझे अदल-बदलकर विश्व में सबसे विस्तृत मानी जाने वाली आठ मेट्रो लाइनों पर यात्रा का अवसर मिला, जिसमें साथी, सहभागी और मार्गदर्शक बने टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ फॉरेन स्टडीज में विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. ऋषिकेश मिश्र।
यहां सुरक्षित हैं नेताजी की यादें
जैसे ही हम रेंकोजी मंदिर के भीतर आए, बाहर जापानी और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी लिखा एक हस्तलिखित पोस्टर देखा, ‘यहां कचरा पैâलाना अपराध है।’ जापानियों की भारतीय स्वतंत्रता के इस नायक के प्रति श्रद्धा का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि उन्होंने इस स्मारक को जहां नेताजी का अंतिम संस्कार किया गया और बौद्ध धर्म की परंपरा के अनुसार, उनका अस्थिकलश रखा हुआ है। मंदिर का दर्जा दे रखा है। नेताजी की प्रतिमा बाहर हरे-भरे प्रांगण में ही मौजूद है। बगल में हैं विजिटर्स बुक, हाथ धोने के लिए जलकुंड, तरह-तरह के स्थापत्य और दूसरे अलंकरण, जैसे आमतौर पर गर्भगृह के बाहरी तरफ हुआ करते हैं। मंदिर प्रांगण में इस वक्त हम दो ही अकेले हैं।
जापानी शैली के किसी बौद्ध और शिंटो धर्मस्थल से मिलते रेंकोजी मंदिर के अंतरंग भाग में अस्थिकलश के आस-पास रखे हुए हैं नेताजी के विविध मुद्राओं में चित्र, कुछ अकेले और कुछ जानी-मानी हस्तियों व उनके संदेशों के साथ, जिनमें जापानियों के साथ डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पं. जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, अटलबिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी के चित्र हैं, जो यहां आकर उन्हें अपने श्रद्धासुमन अर्पित कर चुके हैं।
नेताजी ने जापानियों के सहयोग से भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के जो प्रयत्न किए, आज इतिहास का हिस्सा हैं। इसकी शुरुआत १९४३ से होती है, जब नेताजी टोक्यो में जापानी विदेश मंत्री शिगेमित्सु, सेनाध्यक्ष सुगियामा तथा अन्य उच्च अधिकारियों से भेंट के बाद १० जून, १९४३ को प्रधानमंत्री तोजो से मिले थे। इसका ही परिणाम था कि १६ जून को जापानी संसद के विशेष सत्र में तोजो ने भारत की आजादी की लड़ाई में जापान द्वारा हरसंभव सहायता का वादा किया। २१ अक्टूबर, १९४३ को नेताजी द्वारा गठित आजाद हिंद की निर्वासित सरकार को जिन नौ देशों ने मान्यता प्रदान की, उनमें जापान पहला था। इसी महीने नेताजी टोक्यो में ही आयोजित वृहत्तर पूर्वी एशिया सम्मेलन में सम्मिलित हुए। इस प्रवास के दौरान वे जापान के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री शिबूसावा के परिवार के साथ रहे। १९४४ में अपनी आखिरी यात्रा में वे सम्राट हिरोहितो, नए प्रधानमंत्री कोइसो और सोवियत राजदूत से भी मिले। उनकी भेंट महान भारतीय क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से भी हुई।
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में नेताजी के नेतृत्व को पूरे जापान ने सम्मान दिया। विश्वयुद्ध में अपनी अपमानजनक पराजय के बाद भी जापान ने उन्हें विमान मुहैया कराया, ताकि भारत के स्वाधीनता आंदोलन की कमान संभाले रखने के लिए वे किसी माकूल जगह पर पहुंच जाएं, लेकिन १५ अगस्त, १९४५ को द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति की
के सिर्फ तीन ही दिन बाद १८ अगस्त, १९४५ को टोक्यो आते वक्त ताइवान के आकाश में हुई एक भीषण विमान दुर्घटना ने उनके सपने का अंत कर दिया।
नमनभूमि रासबिहारी बोस की
डॉ. ऋषिकेश मिश्र के संग-सहारे टोक्यो की हमारी श्रद्धांजलि यात्रा का अगला पड़ाव था टोक्यो विश्वविद्यालय के पास तामा कब्रिस्तान में स्थित रासबिहारी बोस का स्मारक, जहां २१ जनवरी, १९४५ को ५८ वर्ष की आयु में तपेदिक और फेफड़ों की बीमारी से निधन के बाद जापानी रीति-रिवाजों के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार हुआ था। सुनसान सड़क के दोनों ओर नीरव शांति के बीच जापानी शैली का सादा सा समाधि स्थल, जहां ३० वर्षों तक जापान में रहकर भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाला यह महान क्रांतिकारी चिरनिद्रा में लीन है।
अंग्रेज वॉयसराय लॉर्ड रीडिंग पर बम फेंकने सरीखे कई अभियोगों में १९१५ में भारत से फरार होकर रासबिहारी बोस जब भारत के कई क्रांतिकारियों के साथ जब छद्मनाम व वेश में जापान में भूमिगत जीवन जी रहे थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार करके मृत्युदंड के लिए भारत भेज दिए जाने का वारंट जारी किया था। ऐसे में होटल व्यवसायी ऐजो सोमा व उनकी पत्नी कोक्को सोमा ने जापान के ब्लैक ड्रेगन पार्टी के वयोवृद्ध नेता मित्सुरू तोयामा के आग्रह पर उन्हें संरक्षण ही नहीं दिया, ब्रिटिश सरकार के गुप्तचरों के चंगुल से बचाने के लिए जापानी नागरिक बनाने की शर्तों की पूर्ति हेतु अपनी २० वर्षीय पुत्री तोशिको का विवाह भी उनके साथ करा दिया। मार्च, १९२५ में उनकी मौत के बाद कोक्को सोमा ने ही नाती-नातिन को अपने पास रखकर पाला-पोसा। १९४२ में टोक्यो के सानो होटल में २८ मार्च से तीन दिन का ‘भारतीय स्वतंत्रता सम्मेलन’ हुआ था, जिसकी अध्यक्षता रासबिहारी बोस ने की। रासबिहारी भूमिगत दिनों में ताजिंदगी जापान में ही रहकर भारतीय स्वतंत्रता के लिए इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और आई.एन.ए. जैसा सशस्त्र मिलीशिया गठित कर उनके द्वारा दक्षिण पूर्वी एशिया के प्रवासी भारतीयों में जागृति लाने और लेखों व भाषणों द्वारा भारतीय स्वतंत्रता के लिए अपने मिशन को आगे बढ़ाने में जुटे रहे। जापान सरकार ने उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन’ पुरस्कार से सम्मानित किया।
जापान के राष्ट्रनायक जस्टिस पाल
जब हर ओर से उळघ्थ्ऊभ्, उळघ्थ्ऊभ् के पैâसलों की गरज थी, र्ध्ऊ उळघ्थ्ऊभ् की एक अकेली दहाड़ विशिष्ट लोगों से खचाखच भरे टोक्यो अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के कक्ष को सिहरा गई। यह निर्णयकारी दिन था १२ नवंबर, १९४८ को टोक्यो में विशेष रूप से कायम इस अदालत में जापान के उन ५५ युद्धबंदियों के मुकदमे का, जिनमें द्वितीय विश्वयुद्ध में परास्त जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री तोजो भी शामिल थे। दुनियाभर से आए ११ दिग्गज न्यायाधीशों में से १० जब एक के बाद एक इन युद्धबंदियों में से २८ को युद्ध अपराधी करार देकर उन्हें फांसी देने की सिफारिश कर रहे थे, तब उनसे अलग अमेरिका और ब्रिटेन का दबाव को धता बताते हुए विरोध में एकमात्र निर्णय देने का साहस दिखलाय। जूरी में शामिल एकमात्र भारतीय न्यायाधीश ने, जिन्हें इतिहास ने न्यायमूर्ति डॉ. राधाबिनोद पाल (२७ जनवरी, १८८६ – १० जनवरी, १९६७) के रूप में याद रखा है। टोक्यो के हृदय भाग की सैर कराते हुए डॉ. मिश्र मुझे जापान के सम्राट के निवास इंपीरियल पैलेस के उत्तर-पश्चिम कितानोमारू पार्क से सटे यासुकूनी मंदिर के पास ले आए थे, जिसके भीतर उनकी प्रतिमा मौजूद है।
अन्य न्यायाधीशों के विपरीत अपने निर्णय में जस्टिस पाल ने बताया कि किस तरह विश्वयुद्ध के विजेता मित्र राष्ट्रों ने भी संयम और अंतर्राष्ट्रीय कानून की तटस्थता के सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाई हैं और जापान के आत्मसमर्पण के संकेतों को अनदेखा करते हुए हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमबारी से लाखों निर्दोष लोगों की हत्या के पापी हैं। १२३२ पृष्ठों पर लिखे गए उनके अकाट्य तर्कों को देखकर न्यायाधीशों को क्लास-ए से बी तक के अनेक अभियुक्तों को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिनमें कई को मृत्यु दंड मिलना निश्चित था।
जब हम जस्टिस पाल की इस प्रतिमा के सन्मुख थे तो हमने अपने साथ कई जापानियों को भी श्रद्धा से झुकते देखा। अपने पैâसले से भारत को विश्व प्रतिष्ठा दिलाने वाले इस भारतीय न्यायविद को जापान में राष्ट्रीय नायक का दर्जा हासिल है। वहां उनके नाम एक संग्रहालय और शोध केंद्र है और पाठ्यपुस्तकों में उनके बारे में पढ़ाया जाता है। १९६६ में सम्राट हिरोहितो ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘कोक्को कुनासाओ’ से सम्मानित किया। टोक्यो की सुप्रीम कोर्ट के सामने उनकी प्रतिमा के साथ टोक्यो और क्योटो में दो व्यस्त सड़कों का नाम उनके नाम पर है। निहोन यूनिवर्सिटी ने भी उनका सम्मान किया। जापान के प्रधान मंत्री शिंजो आबे अपनी भारत यात्रा के दौरान उनके बेटे से मिले।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर
संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
