मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : महंगाई पर खामोशी तोड़ो?

तड़का : महंगाई पर खामोशी तोड़ो?

कविता श्रीवास्तव

महंगाई कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन आज महंगाई पर चर्चा ही कम हो गई है। चीनी के दाम बढ़े हुए हैं, त्योहारों के मौसम में पनीर और मावे की मांग बढ़ी है तो इनके दाम भी आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहे हैं। सब्जियों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। घी महंगा है, रसोई गैस महंगी है और रोजमर्रा की जरूरत की लगभग हर चीज खरीदना मुश्किल हो रह है। ऐसे में सवाल यही है कि आम आदमी अपनी रसोई चलाए तो कैसे?
एक समय था, जब महंगाई राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा हुआ करती थी। पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़े, गैस सिलेंडर महंगा हो या रेल किराए में मामूली बढ़ोतरी हो, राजनीतिक दल सड़क पर उतर आते थे। मुंबई में तो हमने वह दौर भी देखा है, जब रेलवे किराए में मामूली बढ़ोतरी के विरोध में रेलवे स्टेशनों के बाहर प्रदर्शन होते थे। गैस के दाम में छोटी-सी वृद्धि भी राजनीतिक विरोध का कारण बन जाती थी। तख्तियां उठती थीं, नारे लगते थे और सरकार से जवाब मांगा जाता था। लेकिन आज तस्वीर कुछ अलग है। महंगाई लगातार घरेलू बजट को प्रभावित कर रही है, मगर इस पर राजनीतिक आवाजें नहीं सुनाई देतीं। ऐसा लगता है जैसे महंगाई को जीवन का स्थायी हिस्सा मानकर स्वीकार कर लिया गया है। सबसे ज्यादा दबाव गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग पर है। सरकारें योजनाओं के माध्यम से गरीबों के खातों में सहायता राशि पहुंचाती हैं। लेकिन उस परिवार का क्या जो मेहनत करके कमाता है, टैक्स और तमाम खर्च वहन करता है, सरकारी सहायता की पात्रता में नहीं आता और फिर भी महंगाई की मार सबसे ज्यादा महसूस करता है? मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी विडंबना यही है। कमाई नही बढ़ती है, खर्च बढ़ जाता है। किराया, बच्चों की पढ़ाई, बिजली, गैस, राशन, इलाज, यात्रा और अब हर छोटी-बड़ी जरूरत सब कुछ बजट को लगातार खींच रहा है। महंगाई को केवल आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। महंगाई उस मां की चिंता है जो बाजार में सब्जी खरीदते समय कीमत पूछकर सामान की मात्रा कम कर देती है। महंगाई उस पिता की चिंता है जो महीने के अंत में हिसाब लगाता है कि अगला खर्च कैसे पूरा होगा। महंगाई उस परिवार की चिंता है जो त्योहार मनाना चाहता है, लेकिन मिठाई, दूध, मावा और घी के दाम देखकर बजट बदल देता है। इसलिए अब जरूरत है कि महंगाई को फिर से जनता का मुद्दा बनाया जाए। सत्ता हो या विपक्ष, सबको सवाल पूछना होगा। सरकारों को भी कीमतों को नियंत्रित करने के दीर्घकालिक उपाय करने होंगे, क्योंकि सवाल सिर्फ महंगे सामान का नहीं है। सवाल यह है कि जब खाना ही महंगा हो जाए, तो आम आदमी जिए कैसे? महंगाई कोई ऐसी नियति नहीं है, जिसे चुपचाप स्वीकार कर लिया जाए। इस पर सवाल भी होना चाहिए, जवाब भी मांगा जाना चाहिए और समाधान के लिए आवाज भी बुलंद होनी चाहिए।

अन्य समाचार