मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ : इतिहास का दरबार लगाइए... श्वेत पत्र जारी कीजिए

तीर-ए-तौसीफ : इतिहास का दरबार लगाइए… श्वेत पत्र जारी कीजिए

 तौसीफ कुरैशी

झूठ की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं होती कि वह सच से बड़ा होता है। उसकी सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि उसे बार-बार, हर मंच से, हर माध्यम से दोहराया जाता है। जब तक सच दस्तावेज लेकर सामने आता है, तब तक झूठ अपना काम कर चुका होता है। पिछले बारह वर्षों की भारतीय राजनीति इसी विडंबना की कहानी है।
श्वेतपत्र की जरूरत
अब समय आ गया है कि कांग्रेस केवल प्रेस कॉन्प्रâेंस न करे। उसे एक ऐसा श्वेत पत्र जारी करना चाहिए, जो इस दौर की राजनीति का सबसे बड़ा दस्तावेज बन जाए। उसमें वर्ष २०११ से २०१४ तक कांग्रेस के नेताओं पर लगाए गए हर बड़े आरोप का विवरण हो। किस मामले में किस नेता को बदनाम किया गया, किस पर सीबीआई भेजी गई, किसके घर ईडी पहुंची, किसे पालतू मीडिया की अदालत में पहले ही दोषी घोषित कर दिया गया या करा दिया गया और आज बारह वर्ष बाद उन मामलों की कानूनी स्थिति क्या है। देश को यह जानने का अधिकार है। डॉ. मनमोहन सिंह कहा करते थे `इतिहास मेरे साथ न्याय करेगा वह कर भी रहा है।’ उस समय सत्ता के शोर में यह वाक्य दब गया था। लेकिन इतिहास धीरे चलता है, अंधा नहीं होता। कोयला आवंटन विवाद में जिस व्यक्ति की ईमानदारी पर उंगली उठाने की कोशिश हुई, जिसके आवास तक सीबीआई पहुंची, आज वही व्यक्ति इस दुनिया में नहीं है और अदालतों की प्रक्रिया ने अनेक आरोपों की चमक फीकी कर दी। सवाल यह है कि उनकी गरिमा को जो ठेस पहुंची, उसकी भरपाई कौन करेगा? क्या राजनीति में चरित्रहनन का भी कोई हिसाब होता है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भाजपा के तिलचट्टों के द्वारा प्रायोजित अन्ना आंदोलन खड़ा कर दिया गया पाखंडियों ने सही लोगों का इस्तेमाल कर लिया और उन्हें पता ही लगा, अब पता चला कि अन्ना आंदोलन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रायोजित था। कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के ही इशारे पर सब कुछ कर रहे थे, लेकिन विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस आंदोलन भटकने नहीं दिया। खैर, २जी घोटाला, कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ इन नामों को इतने वर्षों तक ऐसे उछाला गया, जैसे देश की सारी बुराइयों की जड़ यही हों, जबकि हकीकत में कुछ नहीं था। बाद में कई मामलों में अदालतों के पैâसले आए, आरोप टिक नहीं पाए, लेकिन चुनावी मंचों पर कभी यह नहीं बताया गया कि न्यायालय ने क्या कहा। पालतू मीडिया ने आरोपों की हेडलाइन तो बनाई, पैâसलों की खबर फुटनोट भी नहीं बनाई। क्या यही लोकतंत्र है? नेशनल हेराल्ड मामले में त्याग की देवी सोनिया गांधी और अपनी बेबाकी और निडरता की पहचान बना चुके राहुल गांधी से घंटों पूछताछ हुई। आमजन इसे राजनीतिक प्रतिशोध मानती है। निकला कुछ भी नहीं और कुछ निकलेगा भी नहींr इसकी उम्मीद नहीं यकीन। लेकिन एक लोकतांत्रिक प्रश्न फिर भी खड़ा होता है, क्या किसी भी मामले में राजनीतिक प्रचार और न्यायिक निष्कर्ष के बीच का अंतर जनता को नहीं बताया जाना चाहिए? एक मामले में पैâसला कराकर जननायक राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता ले ली गई। बाद में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद वह वापस आई। यह घटना भी लोकतंत्र के इतिहास का हिस्सा है। लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक लड़ाई अब विचारों से नहीं, जांच एजेंसियों, पालतू मीडिया ट्रायल और छवि निर्माण से लड़ी जाएगी?

विपक्ष की आवाज
विपक्ष के सभी नेताओं को नपुंसक सा बना दिया गया है, लेकिन २०१४ से लेकर आज तक बेखौफ राहुल गांधी सीधे सत्ता के सबसे ताकतवर लोगों से सवाल पूछ रहे हैं, लड़ रहे हैं वह नहीं डरते और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यह जानता है इसीलिए वह भविष्य के लिए भयभीत है। लेकिन यह भी तय है कि जवाब में उन पर और विपक्ष पर नए आरोप लगेंगे। संसद में भी हाल के दिनों में बयानों को लेकर ऐसे विवाद सामने आए, जिनमें विपक्ष ने आरोप लगाया कि उनके कथनों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया। यदि ऐसा है तो यह केवल किसी एक नेता का नहीं, संसदीय संवाद की विश्वसनीयता का प्रश्न है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद छात्र आंदोलन ने यह भी दिखाया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज अहंकारी और हिटलर के दौर में भी मायने रखती है। यही कारण है कि सत्ता बेचैन है और विपक्ष के सामने अवसर भी है, लेकिन अवसर नारों से नहीं, दस्तावेजों से जीते जाते हैं। इसलिए कांग्रेस को चाहिए कि वह देश के सामने एक ऐसा श्वेत पत्र रखे जिसमें हर आरोप, हर एफआईआर, हर छापे, हर पूछताछ और हर अदालत के पैâसले का क्रमवार विवरण हो। कौन-सा मामला किस स्थिति में है? कितने आरोप सिद्ध हुए? कितने नहीं हुए? कितने वर्षों तक जांच चली? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा या उसके पालतू मीडिया व धन्नासेठों ने कितनों का राजनीतिक इस्तेमाल किया? यह सब जनता के सामने होना चाहिए।
सत्ता की लड़ाई
लोकतंत्र में सरकारें बहुमत से बनती और चलती हैं, लेकिन इतिहास बहुमत से नहीं लिखा जाता। इतिहास केवल साक्ष्य देखता है। अदालत केवल प्रमाण देखती है और जनता अंतत: उसी के साथ खड़ी होती है, जिसके पास सच का साहस होता है। संघ और भाजपा की राजनीति का सबसे बड़ा आधार यदि उनका बनाया हुआ नैरेटिव है तो उसका उत्तर केवल एक ही है दस्तावेज, तथ्य और सत्य। क्योंकि झूठ चाहे जितना ऊंचा उड़ ले, उसे अंतत: सच की जमीन पर ही उतरना पड़ता है। अब वक्त आ गया है कि देश में शोर नहीं, हिसाब हो। आरोप नहीं, प्रमाण हों। भाषण नहीं, श्वेत पत्र हो। ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि अहंकारी और हिटलर के इस दौर में राजनीति केवल सत्ता की नहीं, सत्य की लड़ाई थी।
सत्यमेव जयते

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