मुख्यपृष्ठस्तंभतीर-ए-तौसीफ: अमित शाह का सबसे बड़ा राजनीतिक पाठ विचारधारा बनाम ‘विनेबिलिटी’

तीर-ए-तौसीफ: अमित शाह का सबसे बड़ा राजनीतिक पाठ विचारधारा बनाम ‘विनेबिलिटी’

तौसीफ कुरैशी

राजनीति बड़ी निर्मम शिक्षक होती है। वह किताबों से कम और घटनाओं से ज्यादा सिखाती है। आज भारतीय राजनीति के जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, उसमें एक विचित्र बात कहनी पड़ रही है। विपक्ष को अमित शाह का धन्यवाद करना चाहिए। इसलिए नहीं कि उन्होंने विपक्ष को मजबूत किया है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने उसकी सबसे बड़ी कमजोरी को नंगा करके रख दिया है।
पिछले दो दशकों में भारतीय राजनीति में एक नया शब्द सबसे प्रभावशाली बन गया, ‘विनेबिलिटी’। कौन जीत सकता है, यह सवाल इतना बड़ा हो गया कि कौन विचारधारा से जुड़ा है, कौन पार्टी के संघर्षों में साथ खड़ा रहा है, कौन संगठन की आत्मा को समझता है, ये सब सवाल पीछे छूट गए। टिकट उन लोगों को मिलने लगे जिनके पास पैसा था, प्रभाव था, जातीय समीकरण साधने की क्षमता थी या चुनाव जीतने की कोई गारंटी थी।
उत्तर प्रदेश में यह प्रवृत्ति सबसे साफ दिखाई दी। राजनीति में ऐसे लोग आए, जिनका दल से रिश्ता वैचारिक नहीं, बल्कि अवसरवादी था। वे पहले ठेके लेते थे, फिर टिकट लेने लगे। सत्ता उनके लिए जनसेवा का माध्यम नहीं, निवेश पर प्रतिफल का साधन बन गई। जब राजनीति निवेश बन जाए तो निष्ठा का मूल्य गिर जाता है। ऐसे में दल बदलना कोई नैतिक संकट नहीं रह जाता, बल्कि एक कारोबारी पैâसला बन जाता है।
अमित शाह ने शायद सबसे पहले इस सच को उसकी पूरी कठोरता के साथ पहचान लिया। उन्होंने समझ लिया कि जो नेता लाभ और सुरक्षा की राजनीति करता है, वह विचारधारा के लिए नहीं टिकेगा। फिर उसके सामने सत्ता की ताकत रख दीजिए, जांच एजेंसियों का भय रख दीजिए, राजनीतिक भविष्य का आश्वासन रख दीजिए, वह पाला बदल देगा। यही हुआ भी। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी टूटी, राष्ट्रवादी कांग्रेस में विभाजन हुआ, दिल्ली में आम आदमी पार्टी के कई चेहरे बिखरे, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का तो बहुत ही बुरा हाल हुआ है या हो रहा है। पूरी सियासी कंपनी ही नेताओं सहित खिसक गई। यह सब अचानक नहीं हुआ। इन दलों की संरचना में वही कमजोरी थी, जिसे वर्षों तक ‘विनेबिलिटी’ कहकर नजरअंदाज किया गया। राजनीतिक दल केवल चुनावी मशीनें नहीं होते। वे विचारों के आशियाने होते हैं। जब आशियानों की नींव विचारधारा की जगह अवसरवाद पर रखी जाती है, तब पहली बड़ी आंधी में दीवारें दरकने लगती हैं। इसलिए विपक्ष के सामने सबसे बड़ा प्रश्न भाजपा को हराने का नहीं है। सबसे बड़ा प्रश्न स्वयं को समझने का है। क्या वह ऐसे कार्यकर्ता और नेता तैयार करेगा, जो सत्ता के बिना भी साथ खड़े रहें? क्या वह वैचारिक प्रतिबद्धता को फिर से महत्व देगा? क्या वह टिकट वितरण को केवल जीत की संभावना से नहीं, बल्कि संगठन के प्रति निष्ठा से भी जोड़ेगा? यदि इन सवालों के जवाब नहीं खोजे गए, तो टूटन का यह सिलसिला चलता रहेगा। चेहरे बदलेंगे, झंडे बदलेंगे, लेकिन कहानी वही रहेगी।
अमित शाह का सबसे बड़ा राजनीतिक योगदान शायद यही है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को यह आईना दिखा दिया है।
अब जो इस आईने में अपनी कमजोरी पहचान लेगा, वही भविष्य बनाएगा। जो नहीं पहचानेगा, वह इतिहास की एक और खबर बन जाएगा।
सियासत से आपराधिक, धन्नासेठों, मुखबिर, दलाल प्रवृत्ति के नालायक महत्वाकांक्षी लोगों को किनारे लगाना होगा, क्योंकि वे सियासत में अपना उल्लू सीधा करने आते हैं। वे जैसे भी हो, उद्योग जगत अपने-अपने धंधे को बढ़ाने के लिए और अपराधी अपने अपराध से बचने के लिए सत्ता का सहारा लेते हैं। यह आसानी से हो जाता है, फिर इनको इधर-उधर करने में क्या दिक्कत है। लेकिन अगर विचारधारा पर कायम रहने वाले लोगों को आगे लाया जाए, तो वहां तिकड़म चलना मुश्किल होती है। इसलिए सियासी दल, कांग्रेस या अन्य दलों को भी ऐसे लोगों को आगे लाना चाहिए, जो उनके साथ लंबे समय से चले आ रहे हैं।
सत्यमेव जयते

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