मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तर की बात : सड़क पर उतरे बिना न्याय नहीं मिलता!

उत्तर की बात : सड़क पर उतरे बिना न्याय नहीं मिलता!

रोहित माहेश्वरी
लखनऊ

नोएडा का हालिया मजदूर आंदोलन भले ही फिलहाल थमता हुआ दिख रहा हो, लेकिन इसकी असली कहानी कहीं गहरी है। यह सिर्फ वेतन बढ़ाने से खत्म हुआ संघर्ष नहीं, बल्कि एक ऐसा असंतोष है; जिसे अस्थायी रूप से दबा दिया गया है। २०–२१ प्रतिशत वेतन वृद्धि का फैसला सरकार की संवेदनशीलता नहीं, बल्कि दबाव में लिया गया कदम ज्यादा प्रतीत होता है। सवाल यह है कि जब तक मजदूर सड़कों पर नहीं उतरे, तब तक उनकी समस्याओं पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? भाजपा सरकार लगातार उत्तर प्रदेश को ‘उद्योगों का केंद्र’ बताने में लगी है, लेकिन इस मॉडल में मजदूरों की स्थिति क्या है, यह नोएडा की घटनाओं ने उजागर कर दिया। यह घटना साफ संकेत देती है कि सरकार की नीति ‘पहले संकट, फिर समाधान’ तक सीमित हो गई है।

‘जीरो टॉलरेंस’ की हवा निकली!
बुलंदशहर में जन्मदिन की एक साधारण पार्टी का ट्रिपल मर्डर में बदल जाना सिर्फ आपराधिक घटना नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की बिगड़ती कानून-व्यवस्था का कठोर आईना है। एक युवक द्वारा दूसरे के चेहरे पर केक लगाने जैसी मामूली बात पर शुरू हुआ विवाद कुछ ही मिनटों में गोलीबारी तक पहुंच गया, जिसमें तीन लोगों की जान चली गई। यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर समाज में इतनी हिंसक प्रतिक्रिया क्यों बढ़ रही है और अपराधियों के भीतर कानून का डर क्यों खत्म होता जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार लगातार ‘कानून का राज’ और ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग दिखाई देती है। अगर एक निजी समारोह भी सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक खुद को वैâसे सुरक्षित महसूस करे? घटना के बाद भारी पुलिस बल की तैनाती और कार्रवाई दिखाना आसान है, लेकिन असली चुनौती ऐसी घटनाओं को रोकने की है, जो बार-बार विफल होती दिख रही है। यह घटना बताती है कि सरकार की व्यवस्था अब रोकथाम नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया तक सीमित हो गई है।

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