– जेएनपीटी में चालकों का अकाल
-हजारों ट्रेलर-कंटेनर यहां-वहां फंसे हैं
सुनील ओसवाल / मुंबई
देश की आर्थिक जीवनरेखा माने जाने वाले जेएनपीटी में पैदा हुआ ट्रेलर चालकों का संकट अब केवल परिवहन व्यवस्था की समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था और देश के निर्यात तंत्र के लिए खतरे की घंटी बन चुका है। हजारों कंटेनर बंदरगाह और कंटेनर प्रâेट स्टेशनों के बीच फंसे हुए हैं, जबकि निर्यातकों, किसानों और उद्योग जगत में भारी चिंता का माहौल है।
डेढ़ माह से सिस्टम प्रभावित
विडंबना यह है कि देश के सबसे बड़े कंटेनर बंदरगाह पर यह संकट एक-दो दिन का नहीं, बल्कि पिछले डेढ़ महीने से गहराता जा रहा है। अनुमानित दो से तीन हजार चालकों की कमी ने पूरी लॉजिस्टिक्स सिस्टम को झकझोर कर रख दिया है। करीब एक हजार ट्रेलर और कंटेनर विभिन्न स्थानों पर खड़े हैं। बंदरगाह पर माल पहुंच रहा है, लेकिन उसे आगे ले जाने वाले चालक नहीं हैं।
लॉजिस्टिक सिस्टम चरमराया…आयात-निर्यात पर बढ़ा संकट!
जेएनपीटी में लॉजिस्टिक सिस्टम के चरमरा जाने से हजारों कंटेनर यहां-वहां फंस गए हैं। इस स्थिति ने महाराष्ट्र के कृषि निर्यात क्षेत्र को सबसे अधिक चिंतित कर दिया है। नासिक का प्याज, अंगूर, फल और अन्य उत्पाद समय पर बंदरगाह तक नहीं पहुंचे तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय निर्यातकों की साख को भी झटका लग सकता है। यदि यही स्थिति बनी रही तो किसानों से लेकर निर्यातकों तक करोड़ों रुपयों का नुकसान होने की आशंका है। व्यापारिक संगठनों का आरोप है कि सरकार ने समय रहते चेतावनी संकेतों को गंभीरता से नहीं लिया। परिवहन क्षेत्र वर्षों से प्रशिक्षित चालकों की कमी, खराब सुविधाओं और बढ़ती लागत की समस्या से जूझ रहा है। लेकिन नीति-निर्माताओं ने इसे कभी प्राथमिकता नहीं दी। परिणाम यह है कि आज देश का सबसे बड़ा बंदरगाह चालक संकट के सामने बेबस दिखाई दे रहा है।
चालकों का पलायन
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कंटेनर यातायात में वृद्धि, र्इंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और उत्तर भारत से चालकों के पलायन ने आग में घी डालने का काम किया है। कई चालक अपने गृह राज्यों में रोजगार मिलने के कारण वापस लौट गए हैं, जिससे महाराष्ट्र के परिवहन क्षेत्र में अचानक श्रमिक संकट खड़ा हो गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जेएनपीटी जैसे रणनीतिक बंदरगाह की हालत यह है तो देश के अन्य बंदरगाहों और लॉजिस्टिक्स केंद्रों की स्थिति क्या होगी? यह संकट केवल बंदरगाह प्रबंधन की विफलता नहीं, बल्कि परिवहन और रोजगार नीति की कमियों को भी उजागर करता है।
रेल परिवहन बढ़ाना होगा
बंदरगाह प्रशासन रेल परिवहन बढ़ाने, अतिरिक्त मालगाड़ियां चलाने और चालक भर्ती अभियान जैसे उपायों का दावा कर रहा है। लेकिन उद्योग जगत का मानना है कि जब तक सरकार मिशन मोड में हस्तक्षेप नहीं करेगी, तब तक समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बंदरगाहों के जरिए चलने वाले व्यापार पर निर्भर है। ऐसे में यदि जेएनपीटी पर कंटेनरों की रफ्तार थमती है तो उसका असर केवल मुंबई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महाराष्ट्र के किसानों, उद्योगों और निर्यातकों की जेब तक पहुंचेगा। अब देखने वाली बात यह है कि सरकार इस संकट को एक सामान्य प्रशासनिक समस्या मानती है या फिर इसे आर्थिक आपात स्थिति की चेतावनी समझकर तत्काल कदम उठाती है।
