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कंगाल `महायुति’ का चुनावी जुमला … संजय गांधी निराधार-श्रवण बाल योजना की राशि होगी २,५००!

मंत्रिमंडल में लिया गया फैसला कर्ज का बोझ, वादों की बौछार के बीच फंडिंग का गणित गायब
धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
राज्य की कंगाल तिजोरी पर महायुति सरकार ने फिर से चुनावी जुमला फेंक दिया है। कल हुई मंत्रिमंडल की बैठक में संजय गांधी निराधार और श्रवण बाल योजना की राशि बढ़ाकर २,५०० रुपए करने का फैसला लिया गया। हालांकि, महायुति के इस फैसले के बाद अब सवाल यह उठने लगे हैं कि एक तरफ जहां सरकारी तिजोरी कंगाली की मार झेल रही है, ऐसे में इसके लिए फंड यह सरकार आखिरकार कहां से लाएगी। यह सरकार कर्ज में डूबे महाराष्ट्र में वादों की बौछार तो कर रही है, मगर फंडिंग का गणित पूरी तरह गायब है। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम जनता को राहत देने से ज्यादा आगामी निकाय चुनावों को साधने का सियासी जुमला अधिक है।
उल्लेखनीय है कि महायुति सरकार की कल हुई बैठक में कई अहम निर्णय लिए गए। इसमें संजय गांधी निराधार योजना और श्रवण बाल योजना के लाभार्थियों को दी जाने वाली आर्थिक मदद राशि में बढ़ोतरी पर भी मुहर लगी है। इस फैसले के तहत अब इन योजनाओं के लाभार्थियों को प्रतिमाह १,५०० रुपए से बढ़ाकर २,५०० रुपए किया जा रहा है, जो उनके सीधे खाते में जाएगी। सरकार के इस फैसले ने भले ही कुछ हद तक महिलाओं, पिछड़े वर्ग, आदिवासी, अन्य कमजोर वर्गों, दिव्यांग और वरिष्ठ नागरिक लाभार्थियों को बड़ी राहत मिलने वाली है। इसको लेकर जानकारों का कहना है कि लाडली बहन योजना ने पहले ही सरकार की आर्थिक कमर तोड़ दी है। राज्य में चल रही कई परियोजनाओं और सरकारी कर्मियों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं हैं। गरीबों के लिए शुरू की गई `आनंद का शिधा’ योजना को बंद कर दिया गया है। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि दोनों योजनाओं की भत्ता राशि भले ही सरकार ने बढ़ा दी है, लेकिन इसके लिए फंड का प्रबंध कैसे करेगी।

सब्जबाग दिखाने में व्यस्त
महायुति सरकार ने इस पहले भी कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं। करीब एक साल पहले लाडली बहन योजना शुरू की गई थी। हालांकि, जो महिलाएं संजय गांधी निराधार योजना का लाभ ले रही थीं, उन्हें लाडली बहन योजना का लाभ नहीं मिल रहा था। फिलहाल, इन योजनाओं का भत्ता बढ़ाकर वोटरों को साधने की कोशिश हो रही है। लेकिन असलियत यह है कि राज्य की तिजोरी पहले से ही कर्ज के बोझ तले दबी है। पिछले कुछ महीनों में ही सरकार ने कर्ज लिए, विकास परियोजनाएं अधर में लटक गईं और ठेकेदारों के बकाए भुगतान रुके पड़े हैं। इसके बावजूद महायुति सरकार जनता को सब्जबाग दिखाने में व्यस्त है।

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