मुख्यपृष्ठधर्म विशेषमहादेव को प्रसन्न करते हैं महामंत्र

महादेव को प्रसन्न करते हैं महामंत्र

-शीतल अवस्थी

‘ॐ नम: शिवाय’ महामंत्र भगवान शंकर की उस ऊर्जा को नमन करता है जहां शक्ति अपने सर्वोच्च रूप में आध्यात्मिक किरणों से भक्तों के मन-मस्तिष्क को संचालित करती है। इसीलिए महादेव की साधना में मंत्र विशेष के जाप से उनकी कृपा शीघ्र प्राप्त होती है, जिससे साधक अपनी कामना की पूर्ति करके जीवन में सफलता-सुख-शांति प्राप्त करता है। इन मंत्रों का प्रतिदिन रुद्राक्ष की माला से जप करने से सुख, अपार धन-संपदा, अखंड सौभाग्य और प्रसन्नता में वृद्धि होती है।
सावन और शिव साधना के बीच चंचल और अति चलायमान मन की एकाग्रता एक अहम कड़ी है जिसके बिना परम तत्व की प्राप्ति असंभव है। साधक की साधना जब शुरू होती है तब मन एक विकराल बाधा बनकर खड़ा हो जाता है, उसे नियंत्रित करना सहज नहीं होता। लिहाजा मन को ही साधने में साधक को लंबा और धैर्य का सफर तय करना होता है। इसलिए कहा गया है कि मन ही मोक्ष और बंधन का कारण है। मंत्र एक प्रकार की वाणी है, परंतु साधारण वाक्यों के समान वे हमें बंधन में नहीं डालते, बल्कि बंधन से मुक्त करते हैं और बाधाओं का निराकरण करते हैं। यानी मन से ही मुक्ति है और हम ही बंधन का कारण हैं।
ॐ नम: शिवाय, प्रौं ह्रीं ठ:, ऊर्ध्व भू फट्, इं क्षं मं औं अं, नमो नीलकण्ठाय, ॐ पार्वतीपतये नम: और ॐ ह्रीं ह्रौं नम: शिवाय जैसे मंत्रों का जप पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। जप के पूर्व शिवजी को बिल्वपत्र अर्पित करना चाहिए। उनके ऊपर जलधारा अर्पित करना चाहिए। इसी तरह ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्त्तये मह्यं मेधा प्रयच्छ स्वाहा का जाप भी करें।
इसी तरह शास्त्रों में मानसिक संताप, अशांति और बेचैनी को दूर रखने और छुटकारा पाने के लिए ही कुछ विशेष शिव मंत्र के जप का महत्व बताया गया है। यह पौराणिक विशेष शिव मंत्र, जिसे शिवालय या घर के देवालय में शिव को गंध, अक्षत, फूल, धूप व दीप से पूजा कर मन ही मन बोलें –
नमो रुद्राय महते सर्वेशाय हितैषिणे।
नन्दीसंस्थाय देवाय विद्याभयकराय च।।
पापान्तकाय भर्गाय नमोनन्ताय वेधसे।
नमो मायाहरेशाय नमस्ते लोकशंकर।।
शाम को शिवलिंग का जल स्नान कराने के बाद पंचोपचार पूजा, यानी सफेद चंदन, अक्षत, बिल्वपत्र, आंकडे (मदार) के फूल व मिठाई का भोग लगाकर इस आसान शिव मंत्र का ध्यान जीवन में शुभ-लाभ की कामना से करें व धूप, दीप व कर्पूर आरती करें। यह मंत्र शिव के कल्याणकारी स्वरूप का ध्यान है, जो मृत्युभय, दरिद्रता व हानि से रक्षा करने वाले माने गए हैं-
पञ्चवक्त्र: कराग्रै: स्वैर्दशभिश्चैव धारयन्।
अभयं प्रसादं शक्तिं शूलं खट्वाङ्गमीश्वर:।।
दक्षै: करैर्वामकैश्च भुजंग चाक्षसूत्रकम्।
डमरुकं नीलोत्पलं बीजपूरकमुक्तमम्।।
श्रावण मास के अलावा वर्ष भर महामृत्युंजय मंत्र जपने से अकाल मृत्यु टलती है। आरोग्यता की प्राप्ति होती है। मंत्र इस प्रकार है-
`ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुव: स्व:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।
स्व: भुव: भू: ॐ स: जूं हौं ॐ’
मंत्र वह ध्वनि है जो अक्षरों एवं शब्दों के समूह से बनती है। मंत्र मात्र वह ध्वनियां नहीं हैं जिन्हें हम कानों से सुनते हैं, यह ध्वनियां तो मंत्रों का लौकिक स्वरूप भर हैं। ध्यान की उच्चतम अवस्था में साधक का आध्यात्मिक व्यक्तित्व पूरी तरह से प्रभु के साथ एकाकार हो जाता है जो अन्तर्यामी है। भगवान शंकर ने मस्तक में ही चंद्रमा को दृढ़ कर रखा है लिहाजा साधक की साधना निर्विघ्न संपन्न होती चली जाती है। इस निर्विघ्न साधना में मंत्रों का साथ बेहद महत्वपूर्ण होता है।

अन्य समाचार