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महाराष्ट्र सरकार ने अफसरों के लिए नया प्रोटोकॉल किया जारी…`माननीय पधारें तो कुर्सी छोड़िए अभिवादन कीजिए, जनता आए तो नियम बताइए’

-महीने में दो गुरुवार नेताओं के नाम, पत्रों का जवाब दो महीने में
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
महाराष्ट्र के सरकारी कार्यालयों में फाइलें चलें या न चलें, लेकिन माननीय के आते ही कुर्सी जरूर हिलनी चाहिए। राज्य सरकार ने अधिकारियों और कर्मचारियों को नया प्रोटोकॉल समझाया है। सांसद अथवा विधायक कार्यालय में प्रवेश करें तो खड़े होकर अभिवादन कीजिए, सम्मानपूर्वक उनकी बात सुनिए और नियमानुसार तत्काल सहायता उपलब्ध कराइए।
सरकार ने महीने के पहले और तीसरे गुरुवार को दो घंटे विशेष रूप से जनप्रतिनिधियों से मुलाकात के लिए सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। यह समय सार्वजनिक रूप से घोषित भी करना होगा। माननीय का पत्र आए तो उसे आम नागरिक की शिकायत की तरह अनंतकाल तक फाइलों में भटकने नहीं दिया जाएगा; अधिकतम दो महीने में जवाब देना होगा। यह अलग बात है कि आम आदमी अपने आवेदन की स्थिति पूछते-पूछते कई गुरुवार बूढ़ा हो जाता है। नए निर्देश विधानसभा की विशेषाधिकार समिति द्वारा पुराने आदेशों के कमजोर क्रियान्वयन पर नाराजगी जताए जाने के बाद जारी किए गए हैं। सरकारी भूमिपूजन और उद्घाटन समारोहों में सभी दलों के सांसदों, विधायकों, महापौरों, जिला परिषद एवं नगर परिषद अध्यक्षों और सरपंचों को बुलाना तथा प्रोटोकॉल के अनुसार बैठाना भी अनिवार्य किया गया है। सरकार ने शिष्टाचार की सीमा भी निर्धारित की है। किसी मामले में दोषसिद्ध जनप्रतिनिधि, जांच या सुनवाई के लिए उपस्थित नेता अथवा नामांकन, छंटनी और चुनावी सुनवाई के लिए आए माननीय के स्वागत में अधिकारी को खड़ा होना जरूरी नहीं। ऐसे अवसरों पर उनके साथ सामान्य नागरिक जैसा व्यवहार होगा।
जिस जनता ने कुर्सी दी, उसी को खड़ा रखने का फरमान!
बस यहीं लोकतंत्र मुस्करा देता है, जिस जनता ने माननीय बनाया, उसे खड़े-खड़े इंतजार और माननीय आएं तो पूरा प्रशासन खड़ा। बेहतर होता सरकार साथ में यह आदेश भी निकालती कि अधिकारी बुजुर्गों, दिव्यांगों, किसानों और शिकायत लेकर आए प्रत्येक नागरिक को भी बैठाकर सुनें तथा उसके पत्र का जवाब दो महीने के भीतर दें। आखिर शिष्टाचार पद का विशेषाधिकार नहीं, लोकसेवा का पहला नियम होना चाहिए।

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