मुख्यपृष्ठस्तंभआंकड़ों का आईना धुंधला नहीं होना चाहिए

आंकड़ों का आईना धुंधला नहीं होना चाहिए

तौसीफ़ क़ुरैशी

लखनऊ में ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालयों के प्रमुख जुटे हैं। विषय है— “परिवर्तन के प्रेरक के रूप में गुणवत्तापूर्ण सांख्यिकी।” सुनने में यह एक सरकारी बैठक लग सकती है, लेकिन सच पूछिए तो यह लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है। लोकतंत्र में सबसे बड़ा झूठ भी आंकड़ों का चोला पहनकर सच बन जाता है और सबसे बड़ा सच भी आंकड़ों के अभाव में केवल आरोप बनकर रह जाता है।
आंकड़े कभी बोलते नहीं, लेकिन उनसे बहुत कुछ बुलवाया जाता है। सत्ता उन्हें अपनी उपलब्धियों का प्रमाणपत्र बनाना चाहती है, जबकि विपक्ष उन्हें सरकार की आलोचना का आधार बनाता है। ऐसे समय में राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थानों की जिम्मेदारी केवल आंकड़े जुटाने की नहीं, बल्कि उनकी विश्वसनीयता और निष्पक्षता बनाए रखने की भी होती है।
ब्रिक्स देशों ने लखनऊ में यह स्वीकार किया कि दुनिया तेजी से बदल रही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म का विस्तार हो रहा है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित कर रही है, प्रशासनिक आंकड़ों का दायरा बढ़ रहा है और सरकारों पर समयबद्ध एवं विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध कराने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सांख्यिकी केवल फाइलों में बंद तालिकाएं नहीं रह गई है, बल्कि शासन की दिशा तय करने वाली महत्वपूर्ण शक्ति बन चुकी है।
भारत ने इस बैठक में राष्ट्रीय सांख्यिकी प्रणालियों के आधुनिकीकरण, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशासनिक आंकड़ों के बेहतर उपयोग और डेटा गोपनीयता जैसे विषयों को प्रमुखता दी। यह स्वागतयोग्य पहल है। लेकिन तकनीक जितनी महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता है। यदि आंकड़ों की स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं होगी, तो सबसे आधुनिक तकनीक भी केवल एक चमकदार आवरण बनकर रह जाएगी।
ब्रिक्स देशों का साझा सांख्यिकी प्रकाशन इस बात का संकेत है कि विकास की तुलना अब नारों से नहीं, बल्कि प्रमाणों से होगी। कौन-सा देश गरीबी कम कर रहा है, किसने शिक्षा व्यवस्था में सुधार किया, किसने स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाया और किसने सतत विकास लक्ष्यों की दिशा में वास्तविक प्रगति की—इन सभी प्रश्नों का उत्तर आंकड़े ही देंगे।
लेकिन आंकड़ों का मूल्य तभी है, जब जनता उन पर भरोसा करे। भरोसा आदेश से नहीं, बल्कि पारदर्शिता से पैदा होता है। सांख्यिकी संस्थानों की विश्वसनीयता उनकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। एक बार यह भरोसा टूट जाए, तो लाखों आंकड़े भी जनता का विश्वास वापस नहीं ला पाते।
लोकतंत्र में सच का कोई विकल्प नहीं होता। आज उसी सच का नया नाम गुणवत्तापूर्ण सांख्यिकी है। आंकड़े केवल अर्थव्यवस्था की चाल नहीं बताते, बल्कि समाज की धड़कन भी सुनाते हैं। वे बताते हैं कि खेत में फसल कैसी है, अस्पताल में इलाज कैसा है, स्कूल में पढ़ाई का स्तर क्या है और युवाओं के हाथों में रोजगार है या नहीं।
लखनऊ की यह बैठक तभी सार्थक मानी जाएगी, जब इसका संदेश सरकारी दस्तावेजों तक सीमित न रहकर व्यवहार में भी उतरे। प्रत्येक देश अपनी सांख्यिकी संस्थाओं को राजनीतिक दबावों से मुक्त, तकनीकी रूप से सक्षम और जनता के प्रति जवाबदेह बनाए। क्योंकि लोकतंत्र में आंकड़े किसी सरकार के नहीं, बल्कि जनता के होते हैं।
आखिरकार, विकास का सबसे सच्चा आईना वही है, जिसमें चेहरा वैसा ही दिखाई दे जैसा वह वास्तव में है। यदि आईना धुंधला कर दिया जाए, तो चेहरा सुंदर नहीं हो जाता, केवल सच ओझल हो जाता है।
सत्यमेव जयते।

अन्य समाचार