मुख्यपृष्ठस्तंभरुख-ए-सियासत: युद्ध थमा, अब भारत को खुद से सवाल पूछने होंगे

रुख-ए-सियासत: युद्ध थमा, अब भारत को खुद से सवाल पूछने होंगे

तौसीफ कुरैशी

पश्चिम एशिया में सौ दिन तक चले संघर्ष के बाद यदि युद्धविराम और समझौते की दिशा बनती है, तो स्वाभाविक है कि हर पक्ष अपनी-अपनी जीत के दावे करेगा। कोई इसे ईरान की कूटनीतिक सफलता बताएगा, कोई अमेरिका की रणनीतिक उपलब्धि और कोई इसे केवल युद्ध की थकान का परिणाम मानेगा। लेकिन भारत के लिए असली प्रश्न यह नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा। असली प्रश्न यह है कि इस पूरे घटनाक्रम में हमारी स्थिति क्या रही और आगे क्या हो सकती है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। यही कारण है कि आज पाकिस्तान एक साथ अमेरिका, चीन, रूस और खाड़ी देशों से संवाद बनाए रखने में सफल दिखाई देता है। आर्थिक संकटों से जूझने के बावजूद उसने अपनी भौगोलिक और सामरिक स्थिति को एक कूटनीतिक पूंजी के रूप में इस्तेमाल किया है। यह बात भारत के नीति-निर्माताओं के लिए चिंतन का विषय अवश्य होनी चाहिए।
दूसरी ओर भारत ने पिछले वर्षों में कई शक्तिशाली देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने के दावे किए हैं। लेकिन विदेश नीति में केवल मित्रता की तस्वीरें और सार्वजनिक गर्मजोशी पर्याप्त नहीं होती। किसी भी रिश्ते की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब राष्ट्रीय हितों का टकराव सामने आता है। ऐसे समय में हर देश अपने हितों को प्राथमिकता देता है, चाहे वह कितना ही करीबी साझेदार क्यों न हो। कश्मीर को लेकर भी समय-समय पर विभिन्न देशों और नेताओं के बयान सामने आते रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो, राजनीतिक टिप्पणियां और जन-आंदोलनों की खबरें अक्सर बड़े निष्कर्षों का आधार बना दी जाती हैं। किंतु गंभीर विश्लेषण का तकाजा है कि हर सूचना को तथ्यों और प्रमाणों की कसौटी पर परखा जाए। अंतर्राष्ट्रीय संबंध संकेतों से चलते हैं, लेकिन केवल संकेतों के आधार पर निष्कर्ष निकालना भी जोखिम भरा होता है।
फिर भी यह सच है कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत को आत्मसंतोष से बचना होगा। पड़ोसी देशों की कूटनीतिक सक्रियता, महाशक्तियों के बदलते हित और क्षेत्रीय संघर्षों के प्रभावों का सतत आकलन आवश्यक है। विदेश नीति में सबसे बड़ा खतरा विरोधी की ताकत को बढ़ा-चढ़ाकर आंकना नहीं, बल्कि उसे कम आंकना होता है। युद्ध की धूल बैठने के बाद इतिहास विजेताओं के नाम याद रखता है, लेकिन राष्ट्रों का भविष्य उन सवालों से तय होता है, जिन्हें उन्होंने समय रहते गंभीरता से लिया या अनदेखा कर दिया। शोर बहुत है, दावे भी बहुत हैं, मगर भारत के लिए सबसे जरूरी काम है भावनाओं से नहीं, ठंडे दिमाग और स्पष्ट राष्ट्रीय हितों के आधार पर दुनिया को समझना होगा। सच्चाई यह है कि भारत को संघियों के फादरलैंड की मोहब्बत वाली संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकलना होगा, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकते वह अपने स्वयं घोषित फादरलैंड के बारे में लंबे अर्से से अपने अनुयायियों को भ्रमित करते आए है। हमारी विदेश नीति उनकी एक वर्ग से नफरत ने बहुत नुकसान किया है। अमेरिका आज हमारे साथ जैसे व्यवहार कर रहा है ऐसा व्यवहार कभी नही कर सका, यह हमारी गलतियों का नतीजा है। सत्यमेव जयते..!

बैसाखी नहीं, सांस चाहिए!
कांग्रेस की वापसी का यूपी वाला रास्ता

-कांग्रेस के लिए यह समय शॉर्टकट तलाशने का नहीं, बल्कि लंबी राजनीतिक यात्रा की तैयारी का है। सामाजिक गठजोड़, मजबूत संगठन और विश्वसनीय नेतृत्व ये तीनों पहिए साथ चलेंगे, तभी पार्टी की गाड़ी आगे बढ़ेगी।

प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस आज उस पुराने बरगद की तरह दिखाई देती है, जिसकी जड़ें अभी पूरी तरह सूखी नहीं हैं, लेकिन नई हरियाली भी नहीं फूटी है। सवाल यह नहीं कि कांग्रेस चुनाव जीतेगी या हारेगी। सवाल यह है कि क्या वह फिर से राजनीति में प्रासंगिक हो पाएगी? यूपी की राजनीति का मैदान इस समय दो बड़े सामाजिक समीकरणों से घिरा हुआ है। एक तरफ भाजपा का व्यापक सामाजिक विस्तार है, दूसरी तरफ सपा कंपनी का मजबूत मुस्लिम-यादव आधार। ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना अलग सामाजिक आधार तैयार करने की है। यहीं से ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम समीकरण की चर्चा शुरू होती है। यह कोई नया प्रयोग नहीं, बल्कि कांग्रेस की पुरानी सामाजिक विरासत का हिस्सा रहा है। आज इन तीनों वर्गों के भीतर अलग-अलग तरह की बेचैनियां दिखाई देती हैं। कहीं सम्मान का सवाल है, कहीं प्रतिनिधित्व का, तो कहीं राजनीतिक भरोसे का। कांग्रेस यदि इन भावनाओं को एक साझा राजनीतिक विश्वास में बदल सके, तभी उसके लिए नई संभावनाएं बन सकती हैं।
लेकिन केवल सामाजिक समीकरण काफी नहीं होते। राजनीति में चेहरा भी चाहिए और संगठन भी। कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही है कि उसके पास बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक मजबूत संगठनात्मक ढांचा कमजोर बताया जाता है। इसलिए पार्टी को ऐसा नेतृत्व चाहिए, जो केवल भाषण न दे, बल्कि कार्यकर्ताओं को जोड़ सके, संगठन में भरोसा पैदा करे और सभी वर्गों के बीच संवाद कायम रख सके। किसी भी अध्यक्ष या नेता का चयन केवल जातीय पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी संगठन क्षमता, स्वीकार्यता और कांग्रेस की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता के आधार पर होना चाहिए। ऐसा नेतृत्व ही अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच संतुलन बना सकता है और पार्टी को नई ऊर्जा दे सकता है।

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