रुख-ए-सियासत : तौसीफ कुरैशी
सहारनपुर की सियासत में रैली सिर्फ रैली नहीं होती। यहां रैली शक्ति प्रदर्शन होती है, भीड़ संगठन का प्रमाणपत्र होती है और मंच पर किसके पीछे कौन खड़ा है यह आने वाले चुनाव की पटकथा का पहला पन्ना माना जाता है। इसलिए सपा कंपनी की पांच सितंबर को प्रस्तावित रैली का अचानक रद्द होना, जितना प्रशासनिक या संगठनात्मक पैâसला दिखाई देता है, उसके पीछे चल रही सियासी खींचतान उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है।
कहानी शुरू होती है चौधरी परिवार से। स्वर्गीय चौधरी यशपाल सिंह के परिवार की सहारनपुर और आसपास की राजनीति में पहचान ही ऐसी रही है कि रैली हो तो भीड़ जुटे और थैली हो तो आयोजन खड़ा हो जाए।
उनके पुत्र चौधरी रुद्रसेन और चौधरी इंद्रसेन को जब सपा के मालिक ने पांच सितंबर की रैली की जिम्मेदारी दी तो जाहिर है कि भरोसा किसी कारण से ही किया गया होगा। चौधरी परिवार भी इसी भरोसे को अपनी राजनीतिक पूंजी समझकर मैदान में उतर गया। तैयारियां शुरू हुर्इं और संदेश गया कि रैली अपने बूते खड़ी की जाएगी। लेकिन राजनीति में समस्या यह नहीं होती कि कोई कार्यक्रम सफल होगा या नहीं। असली समस्या यह होती है कि सफलता का श्रेय किसके खाते में जाएगा। यहीं से सपा की अंदरूनी खेमेबंदी सड़क पर आती दिखाई दी। कुछ सपाइयों को शिकायत हुई कि रैली की तैयारियों में दूसरे नेताओं से पर्याप्त सहयोग और भागीदारी नहीं मांगी जा रही। शिकायतें सहारनपुर से लखनऊ पहुंचीं और फिर लखनऊ की सियासत ने सहारनपुर की रैली का रास्ता बदल दिया। रैली रद्द हो गई। लेकिन सियासत का असली मजा तो इसके बाद आया। अखिलेश यादव पांच सितंबर को सहारनपुर नहीं आएंगे, मगर तीन सितंबर को आ गए। और जिस ताकत के भरोसे रैली खड़ी की जा रही थी, उसी चौधरी परिवार के साथ खड़े होकर उन्होंने यह संदेश दे दिया कि रैली भले ही रद्द हुई हो, चौधरी परिवार को रद्द नहीं किया गया है। बल्कि कहानी में एक और अध्याय जुड़ गया देवबंद के पूर्व विधायक मनोज चौधरी के घर पहुंचकर अखिलेश यादव ने देवबंद की सियासत में उनकी दावेदारी को सार्वजनिक रूप से वह वजन दे दिया, जिसकी तलाश कई दूसरे दावेदारों को थी लखनऊ से अखिलेश के साथ आई सांसद चौधरी इकरा हसन व विधायक चौधरी नाहिद हसन भी चौधरी मनोज के आवास पर मौजूद रहे यह भी चर्चा का विषय रहा।
नकुड से टिकट के दावेदार साहिल खान एयरपोर्ट पर मिले यह भी चर्चा रही कि साहिल खान को अपने साथ लेकर गए हैं मतलब कोई नाराज न हो। सियासत में कभी-कभी एक मुलाकात सौ भाषणों से ज्यादा बोलती है। और जब सियासत का नेता किसी संभावित प्रत्याशी के घर पहुंचता है तो वहां चाय कितनी मीठी थी, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि उस तस्वीर का राजनीतिक स्वाद कितना गहरा है। बाकी दावेदार उस दिन यही सोचते रह गए होंगे कि सियासत में टिकट मांगना अलग बात है और टिकट की तस्वीर बन जाना अलग। हां, राजनीतिक संतुलन साधने की कला भी पुरानी है। अखिलेश यादव पूर्व सांसद हाजी फजुलर्रहमान के आवास पर भी पहुंचे वैसे वह बहुत सीधे और सरल स्वभाव के हैं, कुछ लोग उनका इस्तेमाल करते है। खैर मुलाकातें हुर्इं, नेता मिले और संदेश गया कि किसी को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया गया। लेकिन सियासत में संदेश शब्दों से कम और क्रम से ज्यादा पढ़ा जाता है। सहारनपुर की इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पांच सितंबर की रैली क्यों रद्द हुई। बड़ा सवाल यह है कि रैली रद्द कराने की कोशिश किसे कमजोर करने के लिए थी और रैली के बहाने किसकी ताकत का परीक्षण हो रहा था? क्योंकि सियासत में कभी-कभी मंच टूट जाता है, कार्यक्रम बदल जाता है, तारीख बदल जाती है, मगर तस्वीरें रह जाती हैं। और सहारनपुर की इन तस्वीरों में फिलहाल एक संदेश साफ पढ़ा जा सकता है। सपा कंपनी में वर्चस्व की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। रैली सड़क पर आने से पहले ही रद्द हो गई, लेकिन सपा की गुटबाजी सड़क पर जरूर आ गई। अब देखना यह है कि आने वाले चुनाव में जनता रैली की भीड़ गिनती है या नेताओं की तस्वीरें। सत्यमेव जयते..!
