डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी
देश में पर्यावरण की दो तस्वीरें साथ चल रही हैं। एक तरफ जनता से `एक पेड़ मां के नाम’ लगाने की अपील होती है। वहीं दूसरी तरफ हसदेव अरण्य जैसे घने जंगल अडानी समूह की कोयला खदानों के लिए काटे जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ से गोवा तक, बंदरगाह और बिजली प्रोजेक्ट के नाम पर लाखों पेड़ों की बलि चढ़ चुकी है। नतीजतन, दुनिया के ५० सबसे गर्म शहरों में १० से ज्यादा भारत के हैं। दिल्ली, प्रयागराज ५० डिग्री तक तप रहे हैं। विशेषज्ञ कहते हैं, अंधाधुंध जंगल कटाई और कोयले पर निर्भरता इसकी बड़ी वजह है।
विकास के तीन किरदार
१. जनता: ४५ डिग्री में बिजली कटौती झेलकर सड़क किनारे मरा पौधा सींच रही है।
२. अडानी समूह: रिकॉर्ड समय में मंजूरी लेकर खदान-बंदरगाह चला रहा है। उसके लिए हसदेव के साल के पेड़ सिर्फ कोयले के भंडार हैं।
३. सरकार: गर्मी को ‘जलवायु परिवर्तन’ बताकर एसी कमरों में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का प्लान बनाती है, जहां पर्यावरण नियम रुकावट माने जाते हैं। ऐसे में अब ये सवाल उठता है कि क्या एक उद्योग समूह के मुनाफे के लिए पूरे देश को भट्ठी में झोंकना ‘विकास’ है? जब जनसुनवाई औपचारिकता बन जाए और जंगल बचाने वाले आदिवासियों पर केस हों, तो ये वैâसा पर्यावरण प्रेम?
`एक पेड़ मां के नाम’ से लाखों कटे पेड़ों की राख नहीं ढकेगी। असली पर्यावरण प्रेम नारों में नहीं, नीति और नीयत में दिखता है। वरना आने वाली पीढ़ी पूछेगी, विकास के नाम पर हमारी सांसें क्यों बेच दीं?
