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करोड़ों खर्च, फिर भी मेट्रो ‘ठेके’ के भरोसे!

-तकनीकी व्यवस्था की कमान निजी एजेंसियों को देने की तैयारी
-छोटी सी चूक से यात्री सेवा पर पड़ सकता है असर

सामना संवाददाता / मुंबई
नई मुंबई मेट्रो लाइन-१ की तकनीकी व्यवस्था को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद मेट्रो प्रशासन अपनी सबसे महत्वपूर्ण प्रणालियों के रखरखाव के लिए अब पूरी तरह ठेकेदारों पर निर्भर होता नजर आ रहा है। महा-मेट्रो ने सिग्नलिंग, दूरसंचार और ऑटोमैटिक फेयर कलेक्शन (एएफसी) प्रणाली के रखरखाव के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे  हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर मेट्रो की तकनीकी व्यवस्था की जिम्मेदारी सरकारी तंत्र के बजाय निजी एजेंसियों के भरोसे क्यों छोड़ी जा रही है?
महा-मेट्रो द्वारा जारी टेंडर (एनएम१-एस एंड टी०२/२०२६) के अनुसार, यह अनुबंध १७ नवंबर २०२६ से अगले तीन वर्षों तक लागू रहेगा। इस दौरान मेट्रो की सिग्नलिंग, संचार और टिकटिंग जैसी अत्यंत संवेदनशील व्यवस्थाओं की देखरेख ठेकेदार एजेंसी करेगी।
ठेके पर निर्भरता क्यों?
विशेषज्ञों का मानना है कि मेट्रो जैसी आधुनिक परिवहन व्यवस्था में मजबूत इन-हाउस तकनीकी टीम होना जरूरी है, लेकिन बार-बार रखरखाव के लिए निजी एजेंसियों पर निर्भरता भविष्य में नई चुनौतियां पैदा कर सकती है। यदि ठेकेदार बदलते रहे तो तकनीकी समन्वय और जवाबदेही पर भी असर पड़ सकता है।
अगस्त में खुलेगा टेंडर
निविदा प्रक्रिया २० अगस्त से शुरू होगी और २७ अगस्त तक आवेदन स्वीकार किए जाएंगे। टेंडर २८ अगस्त को खोला जाएगा। नई मुंबई मेट्रो से निर्बाध और विश्वसनीय सेवा की उम्मीद कर रहे यात्रियों के मन में अब यही सवाल उठ रहा है कि करोड़ों रुपए के रखरखाव खर्च और ठेकेदारों के भरोसे चलने वाली व्यवस्था के बीच उन्हें वास्तव में कितनी सुरक्षित, समयबद्ध और बेहतर सेवा मिल पाएगी।
तकनीकी खामी का खतरा, यात्री रहेंगे परेशान?
मेट्रो सेवा की रीढ़ मानी जाने वाली सिग्नलिंग और दूरसंचार प्रणाली में छोटी सी गड़बड़ी भी ट्रेनों की समयबद्धता और सुरक्षा पर असर डाल सकती है। वहीं एएफसी प्रणाली टिकटिंग और किराया वसूली से जुड़ी है। यदि इन व्यवस्थाओं में तकनीकी दिक्कत आती है तो उसका सीधा असर यात्रियों पर पड़ सकता है। ऐसे में करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद जवाबदेही किसकी होगी, यह सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

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