-पारा में नगर निगम की टीम पर हमला,
-चौकी प्रभारी समेत कई घायल; १८ भैंसें जब्त
लखनऊ। राजधानी की यह तस्वीर कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। सड़क पर वर्दीधारी पुलिसकर्मी जमीन पर है और एक युवक उसकी गर्दन के आसपास हाथ डाले दिखाई दे रहा है। तस्वीर अपने आप में भयावह है। अगर पुलिस की वर्दी तक के साथ इस तरह की हाथापाई हो सकती है, तो आम आदमी खुद को कितना सुरक्षित माने?
घटना पारा थाना क्षेत्र के आदर्श विहार गदियाना की है। रविवार को नगर निगम का पशु कल्याण विभाग पुलिस बल के साथ सड़क पर घूम रहे पशुओं को पकड़ने पहुंचा था। इसी दौरान स्थानीय पशुपालकों और अन्य लोगों के विरोध ने हिंसक रूप ले लिया और टीम पर पथराव शुरू हो गया। हमले में नगर निगम के कई कर्मचारी घायल हुए। बुद्धेश्वर चौकी प्रभारी विनय पटेल भी गंभीर रूप से घायल हुए और उनके सिर में चोट आई। सरकारी वाहनों के शीशे भी तोड़ दिए गए। तीन से चार वाहनों के क्षतिग्रस्त होने की बात सामने आई है।
इसके बावजूद नगर निगम की टीम ने अभियान नहीं रोका और मौके से १८ भैंसों को पकड़कर ठाकुरगंज स्थित कांजी हाउस भेज दिया। पशु कल्याण प्रभारी अवधेश कुमार की तहरीर पर नामजद और अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस ने दो लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ भी शुरू की और वीडियो के आधार पर अन्य आरोपियों की पहचान की जा रही है।
यह मामला महज आवारा पशु पकड़ने के अभियान में विरोध का नहीं है। सवाल यह है कि पुलिस की मौजूदगी में सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने का दुस्साहस आखिर पैदा कहां से होता है? सरकारी गाड़ियां तोड़ी जाती हैं, कर्मचारी घायल होते हैं और चौकी प्रभारी तक हमले की जद में आ जाते हैं तो इसे सामान्य विरोध नहीं कहा जा सकता।
लखनऊ पुलिस और नगर निगम दोनों के लिए यह घटना परीक्षा है। केवल मुकदमा दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं होगा। वीडियो और तस्वीरों से आरोपियों की पहचान कर कानून के मुताबिक तेज कार्रवाई जरूरी है, ताकि संदेश साफ जाए कि सरकारी कार्य में बाधा डालना और पुलिसकर्मियों पर हमला करना किसी भी हालत में स्वीकार नहीं होगा।
जब पुलिस से ही डर खत्म हो जाए तो जनता किसके भरोसे?
पारा की घटना एक और सवाल उठाती है कि क्या कुछ इलाकों में पुलिस का भय खत्म हो चुका है। यदि स्थानीय स्तर पर नशे, अवैध कारोबार या वसूली जैसे आरोप पुलिस पर लगते रहे हों तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। बिना प्रमाण किसी डीसीपी या थानेदार पर गांजा-स्मैक बिकवाने अथवा वसूली रैकेट चलाने का आरोप तथ्य के रूप में प्रकाशित करना उचित नहीं होगा। लेकिन शिकायतें हैं तो उनकी जांच भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि पुलिस की विश्वसनीयता कमजोर होगी तो कानून का डर भी कमजोर पड़ेगा।
