मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका: क्या सत्ता को शिक्षित नहीं, अयोग्य डिग्रीधारी वोटर चाहिए?

पॉलिटिका: क्या सत्ता को शिक्षित नहीं, अयोग्य डिग्रीधारी वोटर चाहिए?

के.पी. मलिक

सरकार की प्राथमिकता उसके भाषणों से नहीं, उसके फैसलों से पता चलती है। भाषणों में शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की रीढ़ बताया जा सकता है, नई शिक्षा नीति को ऐतिहासिक परिवर्तन कहा जा सकता है और बच्चों के भविष्य को देश का भविष्य बताया जा सकता है, लेकिन किसी सरकार की शिक्षा के प्रति वास्तविक प्रतिबद्धता उसके भाषणों और विज्ञापनों में नहीं, बल्कि स्कूलों की हालत, शिक्षकों की उपलब्धता, बच्चों के सीखने के स्तर, परीक्षाओं की विश्वसनीयता और युवाओं के भविष्य में दिखाई देती है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के शिक्षा मंत्री का विधानसभा में हिंदी पढ़ते हुए वायरल हुआ वीडियो महज सोशल मीडिया का मनोरंजन मानकर खारिज कर देना आसान है, लेकिन पत्रकारिता का असली काम यहीं से शुरू होता है। सवाल यह नहीं है कि किसी एक दिन एक मंत्री किसी पाठ को कितनी सहजता से पढ़ पाया। असली सवाल यह है कि जिस सरकार के पास करोड़ों बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी है, वह शिक्षा को किस कसौटी पर मापती है और वह वैâसी पीढ़ी तैयार करना चाहती है।
किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत क्षमता को पूरे शिक्षा तंत्र की गुणवत्ता का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा, लेकिन जब शिक्षा विभाग का मंत्री सार्वजनिक रूप से पढ़ने में कठिनाई का सामना करता दिखाई देता है तो यह घटना व्यवस्था पर प्रतीकात्मक सवाल जरूर खड़ा करती है। जिस व्यवस्था में एक शिक्षक से विषय की समझ, बच्चों को पढ़ाने की क्षमता और परिणाम देने की अपेक्षा की जाती है, उस व्यवस्था को चलाने वालों से शैक्षणिक दृष्टि, बौद्धिक क्षमता और शिक्षा के मूल उद्देश्य की समझ की अपेक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए? शिक्षा मंत्रालय कोई सामान्य राजनीतिक विभाग नहीं है। यह वह तंत्र है जो आने वाली पीढ़ी की बौद्धिक नींव तैयार करता है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं हो सकता कि कितने स्कूल बने, कितने टैबलेट बांटे गए, कितनी स्मार्ट कक्षाएं शुरू हुईं या कितने कार्यक्रम आयोजित किए गए। असली प्रश्न यह है कि इन सबके बाद बच्चा कितना समझ रहा है, कितना सीख रहा है और सबसे महत्वपूर्ण है कि कितना सवाल कर रहा है।
‘निपुण भारत’ योजनाओं को व्हॉटसऐप जैसी पहलों की उपयोगिता कितनी कामयाब है? इसको परखना जरूरी है, बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर जोर देना निस्संदेह जरूरी है। यूपी में फाउंडेशनल लर्निंग तथा शिक्षक प्रशिक्षण चल रहे हैं। लेकिन शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल बच्चे को पढ़ना और गिनती सिखाना नहीं हो सकता। उसे यह भी सिखाना होगा कि किसी दावे को वैâसे परखा जाता है, प्रमाण और अफवाह में अंतर क्या है, तर्क क्या होता है, असहमति क्यों जरूरी है और सत्ता से सवाल करना नागरिक का अधिकार ही नहीं, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी भी है। अगर बच्चा शब्द पढ़ना सीख गया लेकिन शब्दों के पीछे छिपे अर्थ को समझना नहीं सीख पाया, अगर वह उत्तर याद कर सकता है लेकिन प्रश्न नहीं बना सकता, तो हमारी शिक्षा अधूरी है।
आज हमारी शिक्षा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा परीक्षा-केंद्रित है। बच्चे से पूछा जाता है कि कितने अंक आए, कितनी रैंक आई और किस परीक्षा में चयन हुआ, लेकिन शायद ही कोई पूछता है कि उसने क्या समझा और क्या नया सवाल पैदा किया। शिक्षा धीरे-धीरे ज्ञान से निकलकर परीक्षा और परीक्षा से रोजगार की दौड़ बन गई है। लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। सरकारी नौकरी उनके लिए केवल रोजगार नहीं, सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का सबसे विश्वसनीय रास्ता बन जाती है। ऐसे में जब परीक्षा प्रणाली पर प्रश्न उठते हैं, पेपर लीक होते हैं, परीक्षाएं रद्द होती हैं या भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक लटकती हैं, तो चोट केवल एक परीक्षा पर नहीं पड़ती; चोट उस युवा के भरोसे पर पड़ती है जिसने अपनी जवानी इस व्यवस्था के भरोसे लगा दी।
पेपर लीक का संकट इसलिए केवल परीक्षा व्यवस्था का संकट नहीं है। यह रोजगार, प्रशासनिक क्षमता और शासन की विश्वसनीयता का संकट भी है। एक तरफ सरकार युवा को देश का भविष्य बताती है और दूसरी तरफ वही युवा पूछता है कि उसका वर्तमान कहां है। वह वर्षों पढ़ता है, कोचिंग की फीस देता है, परिवार की बचत खर्च करता है, परीक्षा देता है और फिर उसे पता चलता है कि प्रश्नपत्र की गोपनीयता ही सुरक्षित नहीं रही। इस पूरी प्रक्रिया में शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान अर्जित करना नहीं, किसी तरह चयन सूची में जगह बनाना रह जाता है। ऐसी स्थिति में क्रिटिकल थिंकिंग की बात करना भी विडंबना पैदा करता है, क्योंकि जिस युवा को व्यवस्था ने लगातार परीक्षा और रोजगार की अनिश्चितता में धकेल दिया हो, उसके पास स्वतंत्र बौद्धिक विकास के लिए समय और संसाधन दोनों कम होते जाते हैं।
यहीं शिक्षा, बेरोजगारी और राजनीति का संबंध समझना जरूरी है। शिक्षित नागरिक सवाल करता है, लेकिन बेरोजगार युवा की पहली चिंता अपने भविष्य को बचाना होती है। जब नौकरी के अवसर सीमित हों और सरकारी भर्ती सबसे सुरक्षित विकल्प बन जाए, तब प्रत्िायोगी परीक्षा व्यवस्था स्वयं एक राजनीतिक प्रश्न बन जाती है।
इसलिए पेपर लीक की हर घटना को केवल प्रशासनिक गड़बड़ी मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह भी है कि ऐसा तंत्र क्यों नहीं बनाया गया जिसमें लाखों युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले लोगों की जवाबदेही तत्काल और निश्चित हो? परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, समयबद्ध भर्ती और स्वतंत्र निगरानी क्यों नहीं हो सकती? यदि सरकारें करोड़ों रुपये खर्च करके शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था का ढांचा तैयार करती हैं तो उसके परिणामों का स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट क्यों नहीं होना चाहिए?
सरकारी स्कूलों की स्थिति भी इसी कसौटी पर परखी जानी चाहिए। किसी शिक्षा नीति का असली रिपोर्ट कार्ड राजधानी के वातानुकूलित सम्मेलन कक्ष में नहीं, उस गांव के सरकारी स्कूल में तैयार होता है जहां बच्चे बैठते हैं। वहां जाकर देखना चाहिए कि कितने शिक्षक उपलब्ध हैं, कितने बच्चे नियमित आते हैं, कितने बच्चे अपनी कक्षा के स्तर की किताब पढ़ सकते हैं, कितने बच्चे गणित समझते हैं और कितने बच्चे बिना डर के शिक्षक से सवाल पूछ सकते हैं। क्योंकि जिस कक्षा में सवाल पूछने वाला बच्चा शिक्षक को परेशान करने वाला माना जाता है, वहां से कल सवाल पूछने वाला नागरिक वैâसे निकलेगा? शिक्षा का पहला संस्कार ही जिज्ञासा है और जिज्ञासा का पहला शब्द है ‘क्यों?’
डिजिटल शिक्षा को भी इसी दृष्टि से देखने की जरूरत है। स्मार्ट क्लास, टैबलेट, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और डिजिटल प्लेटफॉर्म आधुनिक शिक्षा के उपयोगी साधन हैं, लेकिन तकनीक स्वयं शिक्षा नहीं है। बच्चे के हाथ में टैबलेट पहुंच जाना तभी शिक्षा है जब उसके पास सूचना को समझने और उसकी सत्यता जांचने की क्षमता भी हो। आज इंटरनेट पर सूचना की बाढ़ है, लेकिन गलत सूचना भी उतनी ही तेजी से पैâल रही है। इसलिए डिजिटल युग की शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण कौशल केवल कंप्यूटर चलाना नहीं, बल्कि यह समझना है कि स्क्रीन पर दिखाई दे रही सूचना का स्रोत क्या है, उसका प्रमाण क्या है और उसे सच मानने से पहले उसकी जांच कैसे की जाए। यही महत्वपूर्ण सोच है और यही वह क्षमता है जो लोकतंत्र को भीड़तंत्र बनने से बचाती है।
लेकिन यहां एक और गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्या शिक्षा व्यवस्था को सुधारने से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी छवि सुधारना हो गया है? सरकारों को अपनी उपलब्धियां बताने का पूरा अधिकार है, लेकिन जब उपलब्धि की प्रस्तुति उपलब्धि से बड़ी हो जाए, जब स्कूल की वास्तविक स्थिति से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी प्रचारात्मक तस्वीर हो जाए, जब शिक्षक और संसाधनों की समस्या से ज्यादा जोर उद्घाटन, समारोह, वीडियो और सोशल मीडिया संदेशों पर दिखाई देने लगे, तब पत्रकारिता को यह सवाल पूछना ही चाहिए कि शिक्षा पर खर्च और शिक्षा की सार्वजनिक छवि के बीच कितना अंतर है। किसी भी सरकार की शिक्षा नीति का मूल्यांकन उसके विज्ञापन से नहीं, उसके परिणाम से होना चाहिए।
इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिल्ली के प्रतिष्ठित आईआईटी जैसे शैक्षणिक मंच पर बाबा बागेश्वर का उल्लेख भी एक व्यापक बहस को जन्म देता है। यहां मुद्दा किसी व्यक्ति की आस्था का नहीं है और न ही किसी धार्मिक व्यक्ति के सम्मान का विरोध करना उद्देश्य होना चाहिए। सवाल यह है कि देश के सर्वोच्च शैक्षणिक संस्थानों के मंच से सत्ता का संदेश क्या होना चाहिए। आईआईटी जैसे संस्थान वैज्ञानिक सोच, अनुसंधान, नवाचार और तार्किक विवेक के प्रतीक हैं। ऐसे मंचों पर प्रधानमंत्री के शब्द केवल व्यक्तिगत विचार नहीं रहते, वे सार्वजनिक संदेश बन जाते हैं। इसलिए यह पूछना स्वाभाविक है कि हमारे शैक्षणिक मंचों का केंद्रीय संदेश वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रमाण, अनुसंधान और सवाल करने की स्वतंत्रता होना चाहिए या राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रतीकों का विस्तार। भारत में आस्था का अपना स्थान है, लेकिन विश्वविद्यालय का मूल चरित्र प्रश्न करने की स्वतंत्रता है, विज्ञान का मूल चरित्र प्रमाण है और लोकतंत्र का मूल चरित्र असहमति है। इन तीनों को कमजोर करके शिक्षा मजबूत नहीं हो सकती।
असल समस्या यह नहीं है कि किसी मंत्री का वीडियो वायरल हो गया। असली समस्या यह है कि हम उस वीडियो से आगे देखने को तैयार हैं या नहीं। हमें उस बच्चे को देखना होगा जो सरकारी स्कूल में बैठा है, उस शिक्षक को देखना होगा जो संसाधनों की कमी के बीच पढ़ा रहा है, उस युवा को देखना होगा जो प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में अपनी जवानी खपा रहा है, उस अभिभावक को देखना होगा जो कोचिंग की फीस के लिए अपनी बचत खत्म कर रहा है और उस नागरिक को देखना होगा जो सरकारी दावों और जमीन की हकीकत के बीच बढ़ती दूरी को महसूस कर रहा है। यही भारत की शिक्षा की वास्तविक कहानी है।
इसलिए सरकार से सवाल होना चाहिए कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक उपलब्धता का जिलेवार वास्तविक आंकड़ा सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? हर जिले के सीखने  के परिणाम को सार्वजनिक डैशबोर्ड पर क्यों नहीं रखा जाता? प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक या परीक्षा रद्द होने की स्थिति में जवाबदेही तय करने की स्ामयबद्ध व्यवस्था क्यों नहीं है? शिक्षा बजट में खर्च की गई बड़ी रकम और उसके मापनीय परिणाम का स्वतंत्र सामाजिक ऑडिट क्यों नहीं होना चाहिए? और सबसे महत्वपूर्ण, स्कूलों तथा विश्वविद्यालयों में आलोचनात्मक सोच, वैज्ञानिक स्वभाव और संवैधानिक मूल्यों को केवल पाठ्यक्रम की भाषा न बनाकर व्यवहार की संस्कृति क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए?
क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता। लोकतंत्र सवालों से चलता है। शिक्षा सिर्फ नौकरी पाने की सीढ़ी नहीं है। शिक्षा वह शक्ति है, जिससे नागरिक यह समझता है कि सरकार उससे क्या कह रही है, क्यों कह रही है और उसके पैâसलों का असर किस पर पड़ रहा है। इसलिए किसी शिक्षा मंत्री का वायरल वीडियो मज़ाक का विषय बनने के बजाय हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। सवाल मंत्री की व्यक्तिगत कमजोरी से बड़ा है; सवाल उस व्यवस्था का है जो तय करती है कि आने वाली पीढ़ी कितनी पढ़ी-लिखी ही नहीं, कितनी स्वतंत्र और विवेकशील होगी।
बहरहाल, सरकार को वैâसा नागरिक चाहिए? ऐसा नागरिक जो सरकारी घोषणाओं को उपलब्धि मानकर स्वीकार कर ले, राजनीतिक संदेश को तथ्य समझ ले और सवाल करने के बजाय तालियां बजाए? या ऐसा नागरिक जो पढ़े, समझे, तर्क करे, असहमत हो और जरूरत पड़ने पर सत्ता से जवाब मांगे? यही वह बिंदु है जहां शिक्षा और लोकतंत्र एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। सरकार को केवल पढ़ा-लिखा मतदाता नहीं, पढ़ा-समझा नागरिक चाहिए लेकिन दोनों के बीच का फर्क ही लोकतंत्र के भविष्य का सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि सबसे खतरनाक अशिक्षा वह नहीं जिसमें व्यक्ति पढ़ नहीं सकता; सबसे खतरनाक स्थिति वह है जिसमें व्यक्ति पढ़ सकता है, लेकिन सवाल करना भूल जाता है। और यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी पीढ़ी तैयार करने लगे जो किसी तरह डिग्री तो हासिल करे, लेकिन सवाल करने का साहस खो दे, तो फिर हमें शिक्षा की सफलता का नहीं, लोकतंत्र की सेहत का हिसाब मांगना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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