नई दिल्ली। चुनावी चुनौतियों और बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच भाजपा ने अपने राष्ट्रीय संगठन की नई टीम घोषित कर दी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की टीम में १३ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, ८ राष्ट्रीय महामंत्री और १६ राष्ट्रीय मंत्री बनाए गए हैं। पुराने और अनुभवी चेहरों के साथ बड़ी संख्या में नए नेताओं को जगह देकर पार्टी ने साफ संकेत दिया है कि अब उसका जोर संगठन को नए सिरे से कसने पर है।
नई टीम में सबसे ज्यादा चर्चा राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की है। उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर बरकरार रखा गया है। भाजपा की जो नेत्री अध्यक्ष पद के लिए सबसे सशक्त उम्मीदवार थीं उन्हें एक नव सीखिए अध्यक्ष के मातहत उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। राजे के साथ राम माधव, बैजयंत पांडा, रेखा वर्मा और तारिक मंसूर जैसे नेताओं को भी उपाध्यक्ष बनाया गया है। हालांकि इसे राजे को बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने के रूप में प्रचारित किया जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद वास्तव में उनके पुराने राजनीतिक कद की वापसी है, या राजस्थान की सक्रिय सत्ता राजनीति से उन्हें दूर रखने का एक सम्मानजनक रास्ता?
स्मृति की वापसी ज्यादा महत्वपूर्ण
इसके उलट पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की वापसी ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देती है। उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया है। २०२४ में अमेठी लोकसभा चुनाव हारने के बाद वह केंद्र सरकार से बाहर हो गई थीं, लेकिन अब पार्टी ने उन्हें सीधे कोर संगठनात्मक भूमिका में वापस लिया है। आठ राष्ट्रीय महामंत्रियों में स्मृति ईरानी अकेली महिला हैं। इस नियुक्ति के राजनीतिक मायने भी हैं। स्मृति आक्रामक वक्ता हैं, संगठन और चुनाव प्रचार दोनों का अनुभव रखती हैं और राष्ट्रीय मीडिया में भाजपा का जाना-पहचाना चेहरा हैं। ऐसे समय में जब पार्टी को कई राज्यों में संगठन और नैरेटिव, दोनों मोर्चों पर ताकत बढ़ानी है, स्मृति की वापसी भविष्य की बड़ी चुनावी भूमिका का संकेत हो सकती है।
राम माधव भी फिर संगठन में
पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री राम माधव को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। लंबे अंतराल के बाद उनकी औपचारिक संगठनात्मक वापसी भी महत्वपूर्ण है। जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक संगठन और राजनीतिक गठबंधन बनाने के अनुभव के कारण राम माधव की वापसी को भाजपा की रणनीतिक जरूरतों से जोड़कर देखा जा रहा है।
महिला प्रतिनिधित्व पर भी जोर
१३ राष्ट्रीय उपाध्यक्षों में पांच महिला नेता शामिल हैं। इनमें वसुंधरा राजे, डी. पुरंदेश्वरी, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोशी, भारती प्रवीण पवार और रेखा वर्मा शामिल हैं। इसलिए प्रारंभिक सूचना में सामने आया ‘छह महिला उपाध्यक्ष’ का आंकड़ा सही नहीं है। नई टीम का सबसे महत्वपूर्ण संकेत यह है कि भाजपा सिर्फ पुराने दिग्गजों के सहारे नहीं चलना चाहती। बड़ी संख्या में नए नाम शामिल कर राष्ट्रीय नेतृत्व ने पुराने नेताओं, क्षेत्रीय संतुलन, महिला प्रतिनिधित्व और नई संगठनात्मक पीढ़ी को एक साथ साधने की कोशिश की है। पीयूष गोयल को कोषाध्यक्ष जैसी जिम्मेदारी और अनिल बलूनी को महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मीडिया भूमिका में बनाए रखना भी इसी संगठनात्मक पुनर्संतुलन का हिस्सा है। लेकिन वसुंधरा राजे के मामले में कहानी थोड़ी अलग है। भाजपा को तो उनका महत्व समझ आ गया है, मगर राजस्थान की राजनीति में उनका पुराना सिंहासन भी वापस नहीं किया है। यही इस फेरबदल का सबसे दिलचस्प संदेश है, राजे को राष्ट्रीय (उप) पद देकर सम्मान संतुलन, लेकिन सत्ता के असली केंद्र से दूरी भी बरकरार। शायद मोदी- शाह को समझ आ गया है कि अब उनके चेहरे पर संगठन ज्यादा दिन नहीं टिक सकेगा। इसलिए अपने धुर विरोधियों को भी संगठन में जगह देने की कोशिश शुरू हो चुकी है।
राजे को सम्मान या ‘साइड पोस्टिंग’?
वसुंधरा राजे दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और लंबे समय तक प्रदेश भाजपा का सबसे बड़ा जनाधार वाला चेहरा रही हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान भाजपा में नेतृत्व का केंद्र उनसे हटता गया। ऐसे में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी उनके समर्थकों को यह संदेश जरूर देती है कि राजे को पूरी तरह किनारे नहीं किया गया है, लेकिन उन्हें प्रदेश की सत्ता के केंद्र में वापस लाने का कोई संकेत भी इस सूची से नहीं मिलता। यानी राजे का सम्मान बचा है, मगर राजनीतिक नियंत्रण नहीं लौटा। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद बड़ा जरूर है, लेकिन मौजूदा भाजपा की अत्यधिक केंद्रीकृत संगठनात्मक व्यवस्था में इसकी वास्तविक राजनीतिक ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि उन्हें चुनावी राज्यों, संगठन विस्तार अथवा राजस्थान से जुड़े पैâसलों में कितना अधिकार मिलता है।
