रोहित माहेश्वरी / लखनऊ
अखिलेश यादव का जयंत चौधरी पर किया गया तंज केवल दो नेताओं के बीच की बयानबाजी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की गठबंधन राजनीति का आईना है। अखिलेश का यह कहना कि उन्होंने जिसे चवन्नी समझा, उसे रुपया बनाया और रुपया बनने के बाद वही साथ छोड़ गया- सियासत के बदलते चरित्र पर तीखी टिप्पणी है। जयंत चौधरी का पुराना बयान, ‘हम कोई चवन्नी थोड़े हैं कि पलट जाएंगे’, आज के राजनीतिक घटनाक्रम के सामने खड़ा किया जाए तो सवाल स्वाभाविक है कि राजनीति में सिद्धांत अधिक महत्वपूर्ण हैं या सत्ता और चुनावी संभावनाएं?
सपा और आरएलडी का गठबंधन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मजबूत सामाजिक समीकरण का संकेत था। बाद में रास्ते अलग हुए और जयंत भाजपा के साथ चले गए। अखिलेश के लिए यह केवल एक राजनीतिक झटका नहीं, बल्कि उस भरोसे का टूटना भी था, जिसे गठबंधन की बुनियाद माना जाता है। सियासत में गठबंधन बदल सकते हैं, लेकिन जनता बयानों और वादों को लंबे समय तक याद रखती है। यही अखिलेश के तंज का असली राजनीतिक अर्थ है।
४,२०० करोड़ की सड़क पर ७४ गड्ढे!
करीब ४,२०० करोड़ रुपए की लागत से बने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर निर्माण गुणवत्ता और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले में केंद्र और राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, एनएचएआई तथा यूपी परिवहन विभाग से आरोपों पर जवाब मांगा है। याचिका में एक्सप्रेसवे पर ७४ गड्ढे होने और भारी टोल वसूली का भी उल्लेख किया गया है। सवाल यह है कि हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी सड़क की गुणवत्ता पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? भाजपा सरकार विकास और एक्सप्रेसवे को अपनी बड़ी उपलब्धि बताती है, लेकिन जनता के लिए असली विकास चमकते उद्घाटन नहीं, बल्कि मजबूत और टिकाऊ सड़क है। आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं, मगर हाईकोर्ट का जवाब तलब करना गंभीर संकेत है। सरकार को राजनीतिक बचाव के बजाय निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।
