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संपादकीय: भाजपा में बौद्धिक अकाल

‘रस्सी जल जाए पर ऐंठन न जाए’ वाली स्थिति पूरे भारतीय जनता पार्टी की हो गई है। ‘जंतर-मंतर’ पर ‘पैलेट गन’ फायरिंग के मामले में गृहमंत्री अमित शाह को संसद में आकर बयान देना चाहिए और देश से माफी मांगनी चाहिए। इसी मांग को लेकर कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने संसद का कामकाज ठप कर दिया था। शाह तब भाग गए थे। वही शाह अब कांग्रेस पर ‘वंदे मातरम्’ का विरोध करने का आरोप लगाकर इसे ‘बौद्धिक नक्सलवाद’ बता रहे हैं और माफी मांगने की मांग कर रहे हैं। यह बौद्धिक अकाल ही है। स्वतंत्रता आंदोलन, ‘वंदे मातरम्’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसी राष्ट्रीय घटनाओं से अमित शाह और उनकी पार्टी का कभी कोई संबंध रहा ही नहीं। उनकी पार्टी के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी मुस्लिम लीग के बंगाल मंत्रिमंडल में सहभागी थे और ‘भारत छोड़ो’ जैसे स्वतंत्रता आंदोलनों को सख्ती से कुचल देने के लिए अंग्रेजों से कहते थे। इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन से यह बेईमानी करने के लिए भाजपा को ही देश से माफी मांगनी चाहिए, लेकिन शाह कांग्रेस से माफी की मांग कर रहे हैं। शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगीत को पूरा गाने का विरोध हुआ और यह आरोप लगाते समय वे खांस रहे थे। काफी समय तक छिपे रहने के कारण उनको घुटन हुई और उन्हें खांसी आ गई। शाह को खांसी का तुरंत इलाज कराना चाहिए। दिमाग और छाती में कचरा भर जाने से सांस घुटती है और खांसी शुरू हो जाती है। फिर देश का माहौल भी मोदी-शाह के लिए अच्छा नहीं है। उसका असर भी सेहत पर पड़ता ही है। उस पर ‘वंदे मातरम्’ का विवाद उन पर ही उल्टा पड़ने की संभावना ज्यादा है। शाह के पार्टी की मातृ संगठन यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वतंत्रता के बाद करीब ५० साल तक अपने कार्यालय पर कभी तिरंगा नहीं फहराया। उनकी शाखाओं पर कभी स्वतंत्रता दिवस का समारोह भी नहीं हुआ। तिरंगा नहीं फहराया। इस
पाप में शाह-मोदी भी शामिल
थे। तिरंगा न फहराने का कारण शायद यह था कि इन लोगों की मानसिकता भारत से अंग्रेज चले जाएं वाली नहीं थी। महाराष्ट्र की बात करें तो पुणे के शनिवार वाडा पर बालाजीपंत नातू ने १७ नवंबर १८१७ को अंग्रेजों का यूनियन जैक फहराया था। ब्रिटिश अधिकारी जनरल स्मिथ के आदेश पर नातू ने जरीपटका उतारा और अंग्रेजों का झंडा फहराया। जिसके कारण मराठा साम्राज्य के अंत की शुरुआत हुई और ब्रिटिश राज का प्रारंभ हुआ। नातूसाहेब उस समय के भाजपा के प्रतिनिधि रहे होंगे और उनसे ही श्यामाप्रसाद और उनकी अगली पीढ़ी ने प्रेरणा ली होगी। बाद में १५ अगस्त १९४७ को भारत के स्वतंत्रता दिवस पर इसी ऐतिहासिक शनिवार वाडा पर क्रांतिसिंह नाना पाटील के हाथों यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराया गया। नाना पाटील वामपंथी आंदोलन के स्वतंत्रता सेनानी थे और उस दिन शनिवार वाडा पर ‘वंदे मातरम्’ की गर्जना हुई थी। पुणे की संघ शाखाओं और कार्यालयों पर उस दिन भी तिरंगा नहीं फहराया गया था। यह इतिहास अमित शाह को समझना चाहिए। ‘वंदे मातरम्’ क्रांतिकारियों का प्रेरणा गीत और भारत का राष्ट्रगान है, इसका ध्यान रखना चाहिए था। ‘वंदे मातरम्’ की कितनी पंक्तियां गाई जाएं, इस पर शाह ने संसद में कानून बना दिया। वह कानून पास होते समय शाह खुद संसद में मौजूद नहीं थे। क्या यह ‘वंदे मातरम्’ का अपमान नहीं है? ‘वंदे मातरम्’ की कुल ६ पंक्तियां हैं। १८९६ में कोलकाता के कांग्रेस अधिवेशन में सबसे पहले रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘वंदे मातरम्’ का गीत गाया था। तब कांग्रेस के अध्यक्ष रहमतुल्लाह सयानी थे। १९०६ से १९१० के बीच ब्रिटिश सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ पर प्रतिबंध लगा दिया था। ‘वंदे मातरम्’ गाने वालों की गिरफ्तारी हुई थी। ‘वंदे मातरम्’ के लिए
जेल जानेवाले कांग्रेस के ही
लोग थे और ‘वामपंथी’ थे। (जिन्हें आज शाह-मोदी ‘बौद्धिक नक्सलवादी’ कह रहे हैं।) १९३७ में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को पत्र लिखकर सलाह दी थी कि पूरा ‘वंदे मातरम्’ गाने के बजाय पहली दो पंक्तियां (छंद) कांग्रेस वर्विंâग कमिटी को स्वीकार करने चाहिए और उन्हें मान्यता देनी चाहिए। गुरुदेव टैगोर की सलाह पर कांग्रेस वर्विंâग कमिटी ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करके ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो छंद स्वीकार किए। इस कमिटी में महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद, गोविंद वल्लभ पंत, आचार्य कृपलानी जैसे महान लोग थे। १४-१५ अगस्त की मध्यरात्रि को भारतीय स्वतंत्रता का उत्सव संसद का विशेष अधिवेशन बुलाकर मनाया गया। पंडित नेहरू के ‘Trust with Destiny’ वाले ऐतिहासिक भाषण से पहले सुचेता कृपलानी ने ‘वंदे मातरम्’ गाया था, तब पूरा संसद रोमांचित हो गया था। जिस ऐतिहासिक संसद में भारत का पहला स्वतंत्रता सूर्य उगा और ‘वंदे मातरम्’ गाया गया, उसी ऐतिहासिक संसद को मोदी ने ताला लगा दिया और गुजरात के किसी शादी-समारोह हॉल की तरह अपना निजी संसद भवन बना लिया। ये लोग ‘वंदे मातरम्’ और स्वतंत्रता का महत्व क्या जानें? विवाद भड़काना और उस पर अपनी रोटी सेंकना यही इनका धंधा है। पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने साफ कहा है, ‘वंदे मातरम्’ गीत को लेकर कोई विवाद नहीं होना चाहिए। स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस ने भी यह गीत गाया है। बेकार में ‘वंदे मातरम्’ पर विवाद मत करो। मोदी-शाह और उनके लोगों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक नहीं है। इसलिए वो वैचारिक नक्सलवाद का संबंध ‘वंदे मातरम्’ से जोड़ रहे हैं। भाजपा में बौद्धिक अकाल पड़ गया है। इसीलिए गिद्धों की फड़फड़ाहट ‘वंदे मातरम्’ पर शुरू है। ‘वंदे मातरम्’ पर विवाद करना निर्लज्जता है।

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