कविता श्रीवास्तव
देश की सर्वोच्च अदालत में कैंसर की दवाओं पर अत्यधिक मुनाफे का मुद्दा उठने के बाद दवाइयों की कीमतों और चिकित्सा व्यवस्था को लेकर बड़ी चर्चा है। अदालत ने सुनवाई के दौरान दवाइयों की कीमत मूल दाम से दस गुना अधिक वसूलने को एक तरह का कत्लेआम ही बताया। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि किसी कैंसर की दवा की वास्तविक खरीद कीमत कुछ हजार रुपए है और उसका अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) कई गुना अधिक निर्धारित किया जाता है, तो इसका सीधा असर मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ता है।
यह प्रश्न केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं है। अनेक मरीज और उपभोक्ता संगठन लंबे समय से यह मुद्दा उठाते रहे हैं कि कई जीवनरक्षक और आवश्यक दवाओं में भी उत्पादन लागत, थोक कीमत और एमआरपी के बीच बड़ा अंतर देखने को मिलता है। मधुमेह, रक्तचाप, हृदय रोग, संक्रमण और अन्य गंभीर बीमारियों की कुछ दवाओं को लेकर भी समय-समय पर ऐसे सवाल सामने आते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अनेक मामलों में एक ही रासायनिक तत्व (साल्ट) से बनी दवाएं अलग-अलग ब्रांड नामों से बाजार में उपलब्ध होती हैं। इनमें गुणवत्ता और मानकों का पालन आवश्यक है, लेकिन कई बार कीमतों में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। इसी कारण जेनरिक दवाओं को बढ़ावा देने की बात लगातार उठती रही है। जेनरिक दवाएं समान सक्रिय तत्व वाली होती हैं और अक्सर अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं, जिससे आम लोगों की दवाओं तक पहुंच आसान हो सकती है। इसीलिए दवाओं पर समान मार्जिन तय करने की नीति बनाने पर केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए, क्योंकि यह देश के आम जनमानस से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है। यदि दवा व्यापार में पारदर्शिता बढ़ती है और लाभ की सीमा तय होती है, तो मरीजों पर आर्थिक बोझ कम हो सकता है। इसके साथ ही कॉरपोरेट अस्पतालों में मरीजों को विशेष फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए कहे जाने जैसी शिकायतों की भी निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है, ताकि मरीजों को स्वतंत्र रूप से विकल्प चुनने का अधिकार मिल सके।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और उपभोक्ता अधिकार समूहों का मानना है कि जनहित को ध्यान में रखते हुए कुछ महत्वपूर्ण कदमों पर विचार किया जा सकता है। जैसे, आवश्यक दवाओं की मूल्य निगरानी को मजबूत करना, जेनरिक दवाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाना, सरकारी जन औषधि केंद्रों का विस्तार करना तथा दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना। स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य केवल उपचार नहीं, बल्कि सुलभ और किफायती उपचार भी होना चाहिए। जब किसी परिवार की जमा पूंजी दवाइयों और इलाज में खर्च हो जाती है, तब यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय भी बन जाता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि दवा मूल्य निर्धारण, वितरण व्यवस्था और चिकित्सा क्षेत्र की नैतिक प्रथाओं पर गंभीरता से विचार किया जाए, ताकि हर नागरिक को उचित मूल्य पर दवाएं उपलब्ध हो सकें और स्वास्थ्य सेवा वास्तव में जनहितकारी बन सके।
