मुख्यपृष्ठस्तंभकहानी अनकही : धीरे-धीरे खामोश हुआ बचपन

कहानी अनकही : धीरे-धीरे खामोश हुआ बचपन

सना खान

स्नेहा बचपन में बहुत बोलती थी। उसे छोटी-छोटी बातें भी बहुत खुश कर देती थीं। वो अपनी हर बात दौड़कर मां को बताती थी, हर सपना, हर डर, हर छोटी खुशी। लेकिन धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि घर में उसकी आवाज से ज्यादा लोगों का गुस्सा बड़ा है। जब भी वो रोती, उसे कहा जाता – ‘इतनी छोटी बात पर रोते नहीं’ जब वो अपनी बात समझाने की कोशिश करती तो उसे बीच में ही चुप करा दिया जाता। और जब वो उदास होती तो किसी ने ये नहीं पूछा कि उसके अंदर क्या चल रहा है।
बस धीरे-धीरे उसने चुप रहना सीख लिया। अब वो अपने कमरे में बैठकर डायरी में बातें लिखती थी क्योंकि उसे लगने लगा था कि कागज शायद इंसानों से ज्यादा समझते हैं।
घरवालों को लगता था कि स्नेहा अब बहुत समझदार हो गई है। वो ज्यादा सवाल नहीं करती थी, जिद नहीं करती थी हर बात मान लेती थी। लेकिन सच ये था कि उसने उम्मीद करना छोड़ दिया था। उसे हमेशा डर लगता था कि अगर उसने अपनी असली भावनाएं दिखाईं तो शायद फिर उसे ‘जयादा संवेदनशील’ कह दिया जाएगा। धीरे-धीरे वो सबके लिए आसान होती गई और खुद के लिए अजनबी। फिर एक दिन वो घर छोड़कर दूसरे शहर चली गई। नए लोग मिले, नई नौकरी मिली, नई जिंदगी भी मिल गई। लेकिन कुछ चीजें उसके साथ ही चली आईं। आज भी अगर कोई ऊंची आवाज में बात करता तो उसका दिल तेज धड़कने लगता। अगर कोई नाराज हो जाए तो वो तुरंत खुद को गलत मान लेती। और अगर कोई उससे प्यार से पेश आता तो उसे यकीन ही नहीं होता कि वो सच में उस प्यार की हकदार है। क्योंकि कुछ बच्चे बचपन में सिर्फ डांट नहीं सुनते वो धीरे-धीरे खुद को कम समझना सीख जाते हैं। एक रात स्नेहा ने आईने में खुद को देखा और बहुत देर तक रोती रही। क्योंकि पहली बार उसे एहसास हुआ
कि वो पूरी जिंदगी सबको समझने की कोशिश करती रही लेकिन कभी किसी ने उसे समझने की कोशिश नहीं की। कुछ लोग बड़े होकर भी ठीक नहीं हो पाते क्योंकि उनके अंदर आज भी एक बच्चा चुप बैठा होता है जो बस एक बार समझे जाने का इंतजार कर रहा होता है।

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