महंगाई

हर तरफ मच रहा हाहाकार है,
चीजों के दाम आसमान पार हैं।
आम आदमी पे महंगाई की मार है,
कर रही कुछ नहीं, क्यों सरकार है।
पैसे के बिना जीना ही बेकार है,
गरीब की होती इज्जत कहां, यार है।
टूट जाते हैं सभी रिश्ते-नाते यहां,
दुनिया स्वार्थों का एक बाजार है।
बाहर से दिखावे करता हजार है,
दिल में भरा नफरत का गुबार है।
कोई कितना दिखाए हंस के मगर,
हर इंसान यहां जहनी बीमार है।
अमेरिका सबको मिटाने तैयार है,
ईरान को ये जुल्म कहां स्वीकार है।
मची है अफरा-तफरी, देखो दुनिया,
युद्ध के द्वार खड़ी फिर एक बार है।
हर इक सपना होता कहां साकार है,
ख्वाहिशें तो दिल में रहती हजार हैं।
करना ही पड़ता है समझौता गमों से,
रहती कहां सदा जीवन में बहार है।
-राशिद मुरादाबादी

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