मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतितीन पांडे की तिकड़ी, क्या बनेगी सपा की सत्ता की कड़ी?

तीन पांडे की तिकड़ी, क्या बनेगी सपा की सत्ता की कड़ी?

हिमांशु राज

उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ समाजवादी पार्टी ने अपने पुराने सामाजिक आधार के विस्तार की कवायद तेज कर दी है। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के साथ अब ब्राह्मण समाज को जोड़ने की रणनीति पर पार्टी गंभीरता से काम करती दिखाई दे रही है। इस अभियान के केंद्र में सनातन पांडेय, पवन पांडेय और नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय जैसे चेहरे हैं।
बलिया के सांसद सनातन पांडेय ने जिस तरह प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में ब्राह्मण सम्मेलनों के माध्यम से संवाद कायम किया है, उससे सपा के अभियान को प्रारंभिक ऊर्जा मिली है। अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पांडेय को पार्टी ने राम मंदिर से जुड़े चढ़ावे और कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर आक्रामक ढंग से आगे किया है। वहीं, माता प्रसाद पांडेय का अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका पार्टी को राजनीतिक गंभीरता प्रदान करती है। जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में ब्राह्मण समाज की उपस्थिति ने सपा नेतृत्व को उत्साहित किया है और सत्ता पक्ष के लिए इसे एक राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
अखिलेश यादव ने अयोध्या विधानसभा सीट से पवन पांडेय को समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी घोषित कर इस अभियान को और स्पष्ट राजनीतिक स्वरूप दे दिया है। यह केवल एक उम्मीदवार की घोषणा नहीं, बल्कि ब्राह्मण समाज को लेकर सपा की नई रणनीति का खुला संकेत है। जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन में अखिलेश यादव ने कहा कि पीडीए में ‘पी’ का अर्थ पंडित भी है। इसके बाद अयोध्या जैसी राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण सीट से पवन पांडेय को टिकट देकर उन्होंने अपनी बात को जमीन पर उतारने का प्रयास किया है।
अयोध्या से पवन पांडेय की उम्मीदवारी का अपना अलग राजनीतिक महत्व है। राम मंदिर और हिंदुत्व की राजनीति के केंद्र में स्थित इस सीट से एक अनुभवी ब्राह्मण चेहरे को मैदान में उतारना भारतीय जनता पार्टी के लिए सीधी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। सपा ने संकेत दिया है कि पीडीए का दायरा केवल पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसमें पंडित यानी ब्राह्मण समाज को भी सम्मानजनक स्थान दिया जाएगा। इस अर्थ में पवन पांडेय को टिकट देना सपा की ब्राह्मण राजनीति का शंखनाद कहा जा सकता है।
लेकिन क्या तीनों पांडेय सपा को सत्ता में वापस लाने के लिए पर्याप्त हैं? इसका उत्तर अभी सीधे तौर पर ‘हाँ’ नहीं हो सकता। ब्राह्मण समाज किसी एक दल का स्थायी मतदाता नहीं है। वह स्थानीय प्रत्याशी, क्षेत्रीय समीकरण, शासन का अनुभव, कानून-व्यवस्था और नेतृत्व की विश्वसनीयता जैसे अनेक मुद्दों को ध्यान में रखकर मतदान करता है। इसलिए केवल सम्मेलन और प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से व्यापक राजनीतिक बदलाव संभव नहीं होगा।
सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ब्राह्मणों को साथ लाने की कोशिश उसके पीडीए आधार में अविश्वास पैदा न करे। पार्टी को यह संदेश देना होगा कि ब्राह्मणों को केवल चुनावी गणित के लिए नहीं, बल्कि संगठन और सत्ता में सम्मानजनक भागीदारी देने के लिए जोड़ा जा रहा है। टिकट वितरण, संगठनात्मक जिम्मेदारियां और स्थानीय नेतृत्व में भागीदारी ही इस दावे की वास्तविक परीक्षा होगी।
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के पास ब्राह्मण समाज के बीच ऐसा सर्वमान्य, आक्रामक और प्रदेशव्यापी चेहरा फिलहाल स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता, जो सपा के अभियान का सीधा जवाब दे सके। भाजपा का मजबूत संगठन, हिंदुत्व की राजनीतिक छवि तथा केंद्र और प्रदेश सरकार की योजनाएं उसके पक्ष में हैं, लेकिन स्थानीय असंतोष और प्रतिनिधित्व से जुड़ी शिकायतों को नजरअंदाज करना उसके लिए महंगा पड़ सकता है।
सपा के तीनों पांडेय अपनी-अपनी भूमिकाओं में प्रभावी हैं, मगर उन्हें एक साझा राजनीतिक कथा गढ़नी होगी। यदि यह अभियान केवल ब्राह्मण अस्मिता तक सीमित रहा, तो इसका प्रभाव भी सीमित रहेगा। यदि इसे सम्मान, रोजगार, कानून-व्यवस्था, शिक्षा और सर्वसमाज की राजनीति से जोड़ा गया, तभी यह पीडीए के साथ नया सामाजिक संतुलन बना सकता है।
तीन पांडेय की तिकड़ी सपा की रणनीति के महत्वपूर्ण स्तंभ अवश्य हैं, लेकिन सत्ता में वापसी के लिए उन्हें संगठन, नेतृत्व, गठबंधन और बूथ स्तर की तैयारी का मजबूत सहारा चाहिए। ब्राह्मणों की उमड़ी भीड़ एक संकेत है, फैसला नहीं। फैसला तो चुनावी मैदान में मतदाता ही करेगा।

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