उमा सिंह
लगता है लोकतंत्र का नया पाठ्यक्रम तैयार हो चुका है। वर्षों से जनता को बताया जाता रहा कि सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और रोजगार ही विकास के असली पैमाने हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के गोपामऊ विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक श्याम प्रकाश ने इस पूरे सिद्धांत को एक झटके में पलट दिया। उनका कहना है कि चुनाव विकास से नहीं, बल्कि `तिकड़म’ से जीते जाते हैं। विधायक जी का दर्द भी समझिए। उन्होंने सड़कें बनवार्इं, विकास कार्य कराए, जनता की सुविधाओं पर पैसा खर्च किया, लेकिन वोट नहीं मिले। अब बेचारे सोच रहे होंगे कि काश सड़क बनाने की जगह तिकड़म बनाने की पैâक्ट्री खोल ली होती, तो चुनावी नतीजे कुछ और होते।
इस बयान के बाद `विकास’ भी शायद किसी कोने में बैठकर रो रहा होगा। वर्षों से चुनावी मंचों पर उसकी इतनी तारीफ हुई, इतने विज्ञापन बने, इतने पोस्टर छपे, लेकिन आखिर में पता चला कि चुनावी मैदान में उसकी हैसियत सिर्फ एक एक्स्ट्रा कलाकार जितनी है। असली हीरो तो `तिकड़म’ निकली। अब जरूरत इस बात की है कि देश में `राष्ट्रीय तिकड़म विश्वविद्यालय’ खोला जाए। यहां नेताओं को पढ़ाया जाए कि विकास कार्यों में समय बर्बाद करने के बजाय चुनावी गणित, समीकरण साधना, वोट प्रबंधन और राजनीतिक जुगाड़ के आधुनिक तरीके क्या हैं, इस पर लेक्चर दिए जाएं। विधायक जी के `तिकड़म’ बयान पर तो अब विपक्ष भी पूछ रहा है कि अगर चुनाव विकास से नहीं जीतते, तो फिर जनता को विकास के सपने क्यों दिखाए जाते हैं? क्या सड़कें सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए बनती हैं और योजनाएं सिर्फ भाषणों में तालियां बटोरने के लिए?
सबसे दिलचस्प स्थिति जनता की है। बेचारी जनता भी सोच रही होगी कि अगर सड़क बनाने के बाद भी वोट नहीं मिलते तो शायद समस्या सड़क में नहीं, उन लोगों में है जो चुनाव के समय विकास का झंडा उठाते हैं और हारने पर तिकड़म का राग अलापने लगते हैं। फिलहाल, इतना तय है कि विधायक जी ने अनजाने में ही राजनीति का वह अध्याय खोल दिया है, जिसे आमतौर पर बंद अलमारी में रखा जाता है। अब सवाल सिर्फ इतना है, विकास का रिपोर्ट कार्ड दिखाया जाएगा या तिकड़म का सर्टिफिकेट? लेकिन कुछ भी हो भाजपा और भाजपाई दोनों के `विकास’ की परिभाषा गजबे बा…!
