कल मिलने का वादा करके,
कल पर बात टल जाती है।
आस भरी आंखें राह निहारें,
उम्मीद मगर थक जाती है।
मां की चौखट, बाप का आंगन,
हर आहट पर सज जाता है।
आज नहीं, बस कल आऊंगा
कहकर बेटा बच जाता है।
सूरज हर दिन उग आता है,
चांद भी नभ में खिल जाता है।
किंतु जिस कल की बात करें,
वह कब हाथों में आता है?
जो दिन ढलता, बीत जाता,
वह तो केवल अतीत बने।
नए सवेरे की आस लिए,
मानस सपनों के जाल बुने।
कल के भविष्य की खातिर,
दुनिया अनथक दौड़ लगाती है।
पर इस दौड़ की अंतिम रेखा,
कभी न कहीं दिख पाती है।
कल तो काल समान है,
छाया बनकर रह जाता है।
नए वचनों, नई आशाओं का,
झूठा दीप जला जाता है।
आज सदा दर पर बैठा,
अपना परिचय देता है।
“कल” वह यक्ष प्रश्न है,
जिसका भेद न खुल पाया।
जीवन का सच यही कहता
जो है, केवल आज वही।
कल की मृगतृष्णा में खोकर,
खो न देना अपने सभी।
-मुनीष भाटिया
मोहाली
