मनमोहन सिंह
दुनिया सोच रही थी कि डोनाल्ड ट्रंप का १० प्रतिशत वाला अस्थाई वैश्विक टैरिफ खत्म होगा तो सांस लेने की फुर्सत मिलेगी। लेकिन वॉशिंगटन के ‘टैरिफ किंग’ बिना नया टैक्स थमाए वैâसे मान सकते हैं? पुरानी मियाद खत्म होते ही ट्रंप साहब ने ६० देशों पर १० प्रतिशत से लेकर १२.५ प्रतिशत तक का नया टैरिफ दाग दिया और इस बार बहाना बनाया गया है: ‘बंधुआ मजदूरी’ (फोर्स्ड लेबर)!
टैक्स का चाबुक
जी हां, अमेरिका को अचानक दुनिया भर के मजदूरों की ऐसी चिंता सताई है कि उसने ६० देशों के व्यापार पर ‘टैक्स का चाबुक’ चला दिया। नीति सीधी सी है, अगर सुप्रीम कोर्ट आपातकालीन कानूनों वाले पुराने टैरिफ रद्द कर दे, तो कानून की नई धारा (सेक्शन- ३०१) निकालो और नया टैक्स लगा दो!
दिलचस्प गणित
इस फैसले का गणित भी बड़ा दिलचस्प है। भारत समेत १७ देशों को १० प्रतिशत वाली ‘रियायती’ श्रेणी में रखा गया है (क्योंकि भारत ने श्रम कानूनों में कुछ सुधार किए), जबकि चीन, यूरोपीय संघ और कई अन्य देशों को सीधे १२.५ प्रतिशत की श्रेणी में डाल दिया गया। यूरोपीय संघ वाले अब माथा पीट रहे हैं कि आखिर व्यापारिक टैक्स का बंधुआ मजदूरी से क्या कनेक्शन!
बना ग्लोबल श्रम इंस्पेक्टर
लेकिन ट्रंप प्रशासन का तर्क अपना ही है। उनका कहना है, ‘जो देश बंधुआ मजदूरी नहीं रोकते, वे सस्ती चीजें बनाकर अमेरिका के साथ बेईमानी करते हैं।’ यानी अमेरिका खुद को ‘ग्लोबल श्रम इंस्पेक्टर’ मानकर हर उस देश पर जुर्माना ठोक रहा है, जो उसकी शर्तों पर खरा न उतरे। हालांकि, मजेदार बात यह भी है कि तेल, गैस और उर्वरक जैसी अपनी जरूरत की चीजों को इस टैरिफ से चुपके से बाहर रखा गया है!
नए झटके से दुनिया हैरान
दुनिया भर के देश इस ‘नए झटके’ से हैरान हैं और आधिकारिक विरोध दर्ज करा रहे हैं। लेकिन ट्रंप सरकार का मैसेज साफ है, आप कानून बदलो, कोर्ट जाओ या दलीलें दो; अगर वॉशिंगटन के साथ व्यापार करना है, तो जेब ढीली करने के लिए हमेशा तैयार रहो!
