सामना संवाददाता / मीरा रोड
बीती 31 जुलाई की शाम मीरा रोड के विरंगुला केंद्र में एक बेहद अज़ीम और बाअसर अदबी महफ़िल का आयोजन किया गया। स्वरसंगम फाउंडेशन की जानिब से सजी इस महफ़िल में भारतीय कथा जगत के बेताज बादशाह प्रेमचंद और लोक साहित्य के अज़ीम नायक अन्ना भाऊ साठे को उनकी जयंती पर पूरे अदब और एहतराम के साथ याद किया गया।
विपरीत मौसम के बावजूद इस महफ़िल में शहर और आस-पास के इलाक़ों से आए अदीबों, शायरों और पत्रकारों का जज़्बा देखने लायक था। ख़राब मौसम भी अदब के चाहने वालों के क़दम नहीं रोक सका और लोग देर रात तक वक्ताओं के ख़यालात का लुत्फ़ उठाते रहे। इस कामयाब गोष्ठी की सदारत जाने-माने विद्वान प्रो. श्याम दिवाकर ने की, जबकि पूरे कार्यक्रम को शैलेश सिंह ने अपने प्रबुद्ध और मँझे हुए अंदाज़ में आगे बढ़ाया। प्रेमचंद और अन्ना भाऊ साठे की ज़िंदगी और उनके अदब से जुड़े कई ऐसे अनछुए पहलुओं पर रौशनी डाली गई, जिसने सुनने वालों को लगातार चार घंटे तक बाँधे रखा। सुप्रसिद्ध कवि और कथाकार विनोद दास, प्रो. रामबक्ष और प्रो. श्याम दिवाकर के तार्किक व गहरे बयानात ने इस गोष्ठी को एक अलग ही ऊंचाई दे दी। कार्यक्रम की शुरुआत में सुनील ओवाल, क़मर हाजीपुरी और कमल शर्मा ने अपने विचार रखे। इसके बाद महफ़िल में उस वक़्त एक संजीदगी छा गई, जब प्रसिद्ध व्यंग्यकार और चित्रकार श्रीकांत आप्टे ने हरिशंकर परसाई के मशहूर व्यंग्य लेख ‘प्रेमचंद के फटे जूते’ का बेहद असरदार पाठ किया।
अदब के रंग को और गहरा करते हुए राजीव रोहित ने मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी ‘ऐक्ट्रेस’ का पाठ किया, जिसे सबने ख़ूब सराहा। वहीं, सोनू पाहूजा ने प्रेमचंद की कहानी ‘प्रेम की होली’ का एकल रंगमंचीय प्रस्तुति दे कर समां बाँध दिया। उनकी अदाकारी और प्रस्तुति की दर्शकों ने दिल खोलकर तारीफ़ की। इस ख़ास शाम का आग़ाज़ हृदयेश मयंक के स्वागत भाषण से हुआ, जिन्होंने आए हुए तमाम मेहमानों का गर्मजोशी से इस्तक़बाल किया। आख़िर में, इस संजीदा और कामयाब अदबी महफ़िल का हिस्सा बनने के लिए राकेश शर्मा ने संस्था की तरफ़ से सभी दानिशवरों और मेहमानों का दिल से शुक्रिया अदा किया। यह संगोष्ठी इस बात की गवाह बनी कि चाहे हालात या मौसम कैसे भी हों, समाज के दबे-कुचले तबके की आवाज़ बनने वाले प्रेमचंद और अन्ना भाऊ साठे जैसे नायकों के विचार आज भी लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं और हमेशा मशअल-ए-राह बने रहेंगे।
