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अंडरवर्ल्ड सीक्रेट : २३ जून १९९८ दहिसर की मुठभेड़… जहां जीत के साथ शहादत भी लिखी गई

सूरज सिंह

मुंबई अंडरवर्ल्ड के इतिहास में २३ जून १९९८ का दिन एक दर्दनाक और साहसी घटना के रूप में दर्ज है। यह कहानी सिर्फ अपराधियों के अंत की नहीं, बल्कि उन पुलिसकर्मियों की बहादुरी की है जिन्होंने अपने कर्तव्य के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर दी। दहिसर पुलिस थाने के सिपाही नवनाथ शेलार और विलास मोरे उस शाम नियमित गश्त पर थे। स्वामी विवेकानंद मार्ग स्थित एक होटल के पास की खुली जगह में उनकी नजर बद्रू नाम के एक कुख्यात लुटेरे और उसके साथियों पर पड़ी। ये सभी बेफिक्र होकर चाय पी रहे थे, मानो कानून से उन्हें कोई डर ही न हो।
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए दोनों पुलिसकर्मियों ने तुरंत सहायक पुलिस निरीक्षक हेमंत पाटील को इसकी सूचना दी। सूचना मिलते ही पाटील बिना समय गंवाए अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस की हलचल देखते ही बद्रू और उसके साथी सतर्क हो गए और भागने की कोशिश करने लगे।
हेमंत पाटील और उनकी टीम ने तेजी से कार्रवाई करते हुए उन्हें घेरने की कोशिश की। इस दौरान आसपास मौजूद आम नागरिक भी पुलिस की मदद के लिए आगे आए। कुछ क्षणों के लिए ऐसा लगा कि पुलिस ने बाजी मार ली है और अपराधियों को पकड़ लिया जाएगा।
लेकिन तभी हालात अचानक पलट गए। सुरेश मंचेकर गैंग से अलग हुए जन्या पाशी और उसके साथियों के पास मौजूद विस्फोटक अचानक फट पड़े। एक जोरदार धमाके ने पूरे इलाके को हिला दिया। इस विस्फोट में सिपाही नवनाथ शेलार और विलास मोरे समेत दो अपराधी और एक आम नागरिक-कुल पांच लोगों की मौके पर ही मौत हो गई।
धमाका इतना भयानक था कि दोनों पुलिसकर्मियों के शरीर बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गए। यह दृश्य बेहद भयावह था और कुछ ही पलों में माहौल शोक और अफरातफरी में बदल गया। सहायक पुलिस निरीक्षक हेमंत पाटील भी इस विस्फोट में घायल हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद पाटील और उनकी टीम ने हार नहीं मानी। उन्होंने जन्या पाशी और बद्रू को किसी भी कीमत पर भागने नहीं दिया। स्थानीय लोगों की मदद से पुलिस ने जवाबी कार्रवाई करते हुए सभी अपराधियों को मुठभेड़ में मार गिराया। इस ऑपरेशन में पुलिस ने अपराधियों का अंत तो कर दिया, लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी चुकानी पड़ी। दो बहादुर पुलिसकर्मियों की शहादत ने पूरे पुलिस विभाग को झकझोर कर रख दिया।
यह घटना मुंबई अंडरवर्ल्ड के उस दौर की सच्चाई को उजागर करती है, जब अपराधियों के पास आधुनिक हथियार और विस्फोटक होते थे और पुलिस को हर पल अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती थी। नवनाथ शेलार और विलास मोरे की शहादत यह याद दिलाती है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस किस हद तक जाती है। यह सिर्फ एक मुठभेड़ नहीं थी, बल्कि कर्तव्य, साहस और बलिदान की एक ऐसी कहानी थी, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

 

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