मुख्यपृष्ठस्तंभउड़न छू : अथ श्री काकभुशुण्डि कथा

उड़न छू : अथ श्री काकभुशुण्डि कथा

अजय भट्टाचार्य

`रामचरितमानस’ और `योगवसिष्ठ’ के एक प्रसिद्ध पात्र काकभुशुण्डि अपने पहले जन्म में अयोध्या में एक शूद्र थे। वे भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे, लेकिन भगवान विष्णु और अन्य देवताओं से घृणा करते थे। एक दिन जब वे शिव की पूजा कर रहे थे, तभी उनके गुरु उन्हें आशीर्वाद देने आए। अहंकारवश उन्होंने अपने गुरु को प्रणाम नहीं किया। इस पर क्रोधित होकर उनके गुरु ने उन्हें सर्प योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। शिवजी ने उनके गुरु से प्रार्थना करने पर श्राप को बदल दिया और आशीर्वाद दिया कि अगले १,००० जन्मों के बाद वे एक ब्राह्मण कुल में जन्म लेंगे। इस अवधि में विभिन्न योनियों से गुजरने के बाद उनका जन्म एक ब्राह्मण के रूप में हुआ, जहां वे भगवान राम के अनन्य भक्त बने। बाद में लोमश ऋषि के साथ शास्त्रार्थ (बहस) के दौरान, उनके क्रोधित स्वभाव के कारण, उन्हें ऋषि के श्राप से एक कौवे का रूप (काक) मिल गया। शिवजी के आशीर्वाद से काकभुशुण्डि को इच्छामृत्यु प्राप्त है और वे युगों-युगों से जीवित हैं। वेदों और पुराणों में उन्हें एक ऐसे ज्ञानी के रूप में दर्शाया गया है जो `समय के पार’ देख सकते हैं। उनके पास इतनी शक्ति है कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने कई बार रामायण और महाभारत के चक्र को घटित होते देखा है। काकभुशुण्डि ही वह परम ज्ञानी हैं, जिन्होंने भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ को संपूर्ण रामकथा (काकभुशुण्डि रामायण) सुनाई थी और उनके सभी संदेहों का निवारण किया था। हिंदू वांग्मय में इस कथा को समय और ब्रह्मांड के अद्भुत रहस्य के रूप में जोड़ा जाता है। अमरत्व के साथ उन्हें हर युग में रामकथा का दर्शन करने और प्रभु राम की अनन्य भक्ति का अखंड वरदान प्राप्त है। कौवे के रूप में भी उन्होंने भगवान राम की अनन्य भक्ति की। उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं श्रीराम ने उन्हें वरदान दिया कि वे अजर-अमर (चिरंजीवी) रहेंगे और काल या माया उन्हें कभी प्रभावित नहीं कर सकेगी।
हमारे कलियुग की अयोध्या में बने भगवान राम मंदिर ट्रस्ट के लोगों ने एक महिला से काकभुशुण्डि की चांदी की प्रतिमा यह कहकर जमा करवा ली कि अंदर वैâमरा मना है, फोटो और रसीद बाद में व्हॉट्सऐप कर देंगे। वह भक्त महिला आज तक पत्र लिख रही हैं, लेकिन जवाब नदारद है। अब वह पूछ रही है कि आखिर वो दान गया कहां? लगता है त्रेतायुग के काकभुशुण्डि तो अमर थे, लेकिन कलियुग में चांदी वाले काकभुशुण्डि बिना रसीद के ही अंतर्ध्यान हो गए। जिन भक्तों ने अपने आस्था के मानबिंदु भगवान श्रीराम के शृंगार के लिए सोने-चांदी के गहने, रत्न जड़ित किरीट-कुंडल अर्पित किए वे शायद कलियुगी वैâकयियों के कारण रामलला के साथ वनवास पर निकल गए होंगे। ऐसे पापियों के बीच तो यकीनन नहीं होंगे वो वहां। इतना बड़ा अधर्म और इतना बड़ा पाप बिना संरक्षण के संभव ही नहीं है। यही नकली कलियुगी रामभक्तों का यथार्थ है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा व्यंग्यात्मक लेखन में महारत रखते हैं।)

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