मनमोहन सिंह
घने जंगल के बीच, बरगद के पेड़ से लटकती लाश को कंधे पर लादकर राजा विक्रम जैसे ही आगे बढ़े, बेताल फिर से खिलखिलाकर हंस पड़ा। बेताल बोला,`राजन, तू तो बड़ा जिद्दी है। पर १७ अप्रैल २०२६ की इस चुनावी रात में, जब हवाओं में महिला बिल के नाम पर राजनीति का शोर है, मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूं। ध्यान से सुनना, वरना तेरा सिर फटने से तो रहा, पर तेरा लोकतंत्र जरूर फट सकता है।’
बेताल की कथा
`एक देश में एक प्रतापी राजा था। उसे `मास्टरस्ट्रोक’ मारने का बड़ा शौक था। एक दिन उसने एलान किया कि वह महिलाओं को न्याय देने के लिए संसद में उनकी सीटें बढ़ाएगा। पर शर्त ये थी कि इसके साथ `परिसीमन’ का तड़का भी लगेगा। राजा चाहता था कि संसद की सीटें ५४३ से बढ़ाकर ८५० कर दी जाएं। सुनने में तो लगा कि यह नारी शक्ति का वंदन है, पर असल खेल कुछ और था।’ `राजा की योजना थी कि इस संख्या वृद्धि के बहाने हिंदी भाषी प्रदेशों का वर्चस्व बढ़ा दिया जाए और दक्षिण भारत तथा अल्पसंख्यकों की आवाज को नक्शे से ही छोटा कर दिया जाए। यह वैसा ही था जैसे किसी हवेली में औरतों के लिए एक कोना बनाने के नाम पर, पूरी हवेली पर मर्दों का कब्जा और पक्का कर लेना।’ बेताल ने लंबी सांस ली फिर बोला, `लेकिन १७ अप्रैल २०२६ को कुछ अनोखा हुआ। बिखरा हुआ विपक्ष अचानक एक हो गया। उन्होंने सवाल पूछा कि जब २०२३ में ही महिला आरक्षण कानून बन चुका था, तो उसे लागू करने के लिए सीटों के पुनर्वितरण और परिसीमन के पाखंड की क्या जरूरत? क्या ५४३ सीटों में ३३ प्रतिशत आरक्षण नहीं दिया जा सकता?’
`राग दरबारी, जो राजा की आरती उतारने में व्यस्त था, इसे `विपक्ष का महिला-विरोधी चेहरा’ बताने लगा। पर जनता अब समझदार हो रही थी। वह देख रही थी कि वैâसे असम और कश्मीर में परिसीमन के नाम पर प्रतिनिधित्व को कुचला गया। जब यह खेल संसद के स्तर पर होने लगा, तो विपक्ष ने इस सरकारी `झूठ की आंधी’ को उखाड़ फेंका।’ `राजा हार गया, पर उसकी हार को भी चारण मंडल ने `रणनीति’ बताया। राजा अब सड़कों पर है, टीवी पर आकर विपक्ष को कोस रहा है। यहां तक कि चुनाव आयोग भी अब राजा का एक विभाग बनकर रह गया है, जिसे नैतिकता से कोई वास्ता नहीं।’
बेताल रुका और विक्रम की आंखों में झांककर बोला, `तो राजन, अब मेरा सवाल सुन। राजा को पता था कि विपक्ष इस बिल को गिरा देगा, फिर भी उसने इसे पेश किया। क्या यह हार राजा की मूर्खता थी या उसकी कोई गहरी चाल? और क्या लोकतंत्र में प्रधानमंत्री पर भरोसा न करना पाप है जैसा कि राग दरबारी कह रहा है?’
विक्रम का जवाब
`बेताल, राजनीति के इस खेल में भरोसा एक महंगी वस्तु है और सच उससे भी दुर्लभ। राजा की चाल यह थी कि वह खुद को `नारी रक्षक’ और विपक्ष को `नारी विरोधी’ सिद्ध कर सके। पर यह उसकी मूढ़ता थी कि उसने विपक्ष की नई एकता और जनता की जागती हुई चेतना को कम आंका। प्रधानमंत्री पर भरोसा न करना लोकतंत्र का अपमान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है, क्योंकि लोकतंत्र सवाल पूछने का नाम है, अंधभक्ति का नहीं। जब सरकार झूठ को सच की तरह परोसने लगे, तो अविश्वास ही सबसे बड़ा नागरिक धर्म बन जाता है।’ `सही कहा राजन!’ बेताल हंसा। `पर याद रख, अगर जनता अब भी राग दरबारी के इस नशे में सोई रही, तो ये लम्हा जो लोकतंत्र की वापसी का हो सकता था, इतिहास की एक भूल बनकर रह जाएगा।’ इतना कहकर बेताल फिर से उड़कर बरगद के पेड़ पर जा लटका।
