मनमोहन सिंह
रात का सन्नाटा, श्मशान की डरावनी खामोशियां और राजा विक्रम के कंधे पर लटकता वह जिद्दी बेताल। जैसे ही विक्रम ने चलना शुरू किया, बेताल अट्टहास कर उठा।
‘ठहर राजन! आज रास्ता लंबा है, तो क्यों न एक सत्य कथा सुनाई जाए? गौर से सुन, क्योंकि अंत में जवाब न दिया तो तेरे सिर के सौ टुकड़े वैसे ही हो जाएंगे, जैसे आज की दुनिया में झूठ की मार से लोकतंत्र के हो रहे हैं।’
बेताल बोला, ‘हे राजन! देख, इस समय हमारे बीच जो संवाद हो रहा है, उसे समाज के अलग-अलग चश्मे देख रहे हैं। एक वह है जो हमारी बात को ज्यों का त्यों दस लोगों को सुनाता है, वह लुप्तप्राय प्रजाति है। दूसरा वह है जो इसमें मिर्च-मसाला लगाकर बाजार में बेचता है, ताकि उसकी दुकान चल सके और समाज में उसका कद बढ़े। इसे ही आज का ‘मीडिया’ कहते हैं।’
‘राजन, तेरे दरबार में भी ऐसे दरबारी हैं, जो तेरी गलतियों पर परदा डालते हैं और तेरी हर छींक को भी ‘महान गर्जना’ बताते हैं। वहीं मेरे समाज का वह ‘चारण’ है जो मेरी गलतियों को भी मेरी ‘खूबियां’ बनाकर पेश करता है। लेकिन समस्या उनकी नहीं, समस्या उस अभागे की है जो सच बोलने की जुर्रत करता है। जो तेरी और मेरी, दोनों की कमियां उजागर करता है, उसे तेरे चाहने और मेरे चाहने वाले आड़े हाथों लेते हैं। उसे न्यायिक उत्पीड़न और डराने-धमकाने की भट्टी में झोंक दिया जाता है। इसे ही आधुनिक दुनिया ‘प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटना’ कहती है।’
बेताल ने एक लंबी सांस छोड़ी और आगे कहा, ‘सुन राजन, ताजा खबर है कि ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ ने २०२६ की जो सूची जारी की है, उसमें आर्यावर्त १८० देशों में १५७वें पायदान पर लुढ़क गया है। पिछले साल तू १५१ पर था, यानी दिन-दूनी रात-चौगुनी गिरावट हो रही है। हालत यह है कि भूटान और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी भी तुझसे बेहतर दिख रहे हैं। तेरे यहां पत्रकारिता अब ‘कठिन’ नहीं, ‘बेहद गंभीर’ श्रेणी में आ गई है।’
‘राजन, इस गिरावट के पीछे कोई एक कारण नहीं है। यहां मीडिया और राजनीति की जुगलबंदी ऐसी है कि जैसे ‘एक ही थाली के चट्टे-बट्टे’। बड़े कॉर्पोरेट घरानों ने मीडिया पर कब्जा कर लिया है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कानूनों का ऐसा हथियारीकरण हुआ है कि पत्रकार अब ‘कलम की नोक’ पर नहीं, ‘तलवार की धार’ पर चल रहे हैं। जो सच बोलता है, उस पर मानहानि और देशद्रोह के मुकदमे ऐसे चिपक जाते हैं जैसे गुड़ पर मक्खियां…!’
‘इतना ही नहीं राजन, सात समंदर पार शक्तिशाली अमेरिका की भी लुटिया डूब रही है। वह भी ६४वें स्थान पर खिसक गया है। वहां भी सत्ताधीशों ने संस्थानों को अपना ‘हथियार’ बना लिया है। गाजा जैसी जगहों पर तो कलम चलाने वालों का लहू पानी की तरह बह रहा है। पूरी दुनिया में पत्रकारिता का दम घोंटा जा रहा है।’
बेताल ने विक्रम की आंखों में आंखें डालकर पूछा, ‘अब मेरा प्रश्न सुन! जब चारों ओर ‘दरबारी मीडिया’ का शोर हो, जब सच को ‘न्यायिक उत्पीड़न’ के मलबे में दबाया जा रहा हो, और जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं… तो क्या एक राजा का यह धर्म नहीं कि वह प्रजा के सामने सच को आने से न रोके? क्या आलोचना को दबाना ही राजधर्म है? यदि तूने सच जानते हुए भी अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी, तो तेरे न्याय का यह मुखौटा उतर जाएगा। बोल राजन, क्या एक जीवंत लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों की ‘शामत’ आना सही है?’
विक्रम शांत रहे, फिर गंभीरता से बोले, ‘बेताल! लोकतंत्र विश्वास की नींव पर टिका होता है। जब सत्ता आलोचना को सुधार के अवसर के बजाय ‘अपराध’ समझने लगे, तो वह पतन की ओर बढ़ती है। राजा का कर्तव्य चाटुकारों को पालना नहीं, बल्कि उन कड़वे सच बोलने वालों की रक्षा करना है जो उसे आईना दिखाते हैं। अगर आईना तोड़ा जाएगा, तो चेहरा कभी साफ नहीं दिखेगा।’
विक्रम का जवाब सही था, पर शर्त के मुताबिक, जैसे ही उसने मुंह खोला, बेताल पलक झपकते ही उड़कर दूर घने जंगल के बीच अपने पेड़ पर जा लटका और विक्रम उसे पकड़ने पीछे दौड़ पड़े!
