-उमा सिंह
अरे भाई, ई कैसा विकास है, बेटी स्कूल जाने के लिए पैडल मारे तो सरकार को उसकी फिक्र नहीं, लेकिन कोई उसे साइकिल देने निकल पड़े तो प्रशासन का बुलडोजर फौरन हाजिर। वाह रे व्यवस्था! भाषणों में बेटी को पंख देने का दावा और जमीन पर उसकी साइकिल के पहियों में ही कानून का ब्रेक। इसे कहते हैं ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का सरकारी अंदाज!
मामला गाजियाबाद के लोनी का है। समाजवादी पार्टी के नेता अनुज प्रधान ने दसवीं और बारहवीं में ७५ फीसदी या उससे अधिक अंक लाने वाली एक हजार छात्राओं को साइकिल बांटने का कार्यक्रम आयोजित किया था। मकसद था मेधावी बेटियों को प्रोत्साहन देना और स्कूल आने-जाने का सफर आसान बनाना, लेकिन साइकिलें बंटने से पहले ही कार्यक्रम के पंडाल और टेंट पर प्रशासन की कार्रवाई हो गई। दलील दी गई कि जरूरी अनुमति नहीं ली गई थी। आयोजक इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं। अब सवाल यह है कि अनुमति नहीं थी तो नियमानुसार कार्रवाई कीजिए, लेकिन नियमों के पालन के नाम पर संवेदनशीलता को भी बुलडोजर के नीचे क्यों दबा दिया जाता है? आखिर उन छात्राओं का क्या कसूर, जिन्होंने मेहनत से ७५ फीसदी से ज्यादा अंक हासिल किए? उन्हें प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद थी, लेकिन चर्चा उनकी उपलब्धियों के बजाय प्रशासनिक कार्रवाई की होने लगी। भाजपा सरकार से पूछना तो बनता है कि ‘बेटी पढ़ाओ’ का नारा केवल भाषणों और पोस्टरों की शोभा बढ़ाएगा या बेटियों की मुश्किलें भी कम करेगा? नियम सबके लिए समान होने चाहिए, मगर गरीब और मेधावी छात्राओं की मदद के कार्यक्रम में सख्ती दिखाने से पहले कोई दूसरा रास्ता नहीं था क्या? कहीं साइकिल के पहियों से ज्यादा चिंता विपक्ष की सियासत की तो नहीं?
