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जिसका था डर वही हुआ … स्क्रूटिनी की आड़ में साफ हो रहे हैं विरोधी! …चुनाव से पहले ही बढ़त बनाने की कोशिश में भाजपा

मुंबई, कल्याण, पनवेल, धुले में मजबूत प्रत्याशियों की छंटनी

सामना संवाददाता / मुंबई
महानगरपालिका चुनावों से पहले आवेदन फार्मों की स्क्रूटिनी प्रक्रिया अब सियासी विवाद का कारण बनती जा रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि जिस आशंका को लेकर पहले से सवाल उठाए जा रहे थे, वही अब सच होता दिख रहा है। पहले उम्मीदवारों के आवेदन फार्म में कई शर्तें लागू कर नामांकन प्रक्रिया को जटिल बना दिया गया। अब स्क्रूटिनी की आड़ में चुन-चुनकर मजबूत विरोधी प्रत्याशियों के नामांकन रद्द किए जा रहे हैं, ताकि चुनाव से पहले ही भाजपा को बढ़त मिल सके।
भाजपा की यह साजिश विपक्ष के लोगों को समझ में आ रही है। दिखावे के लिए भाजपा ने अपने भी कुछ उम्मीदवारों को बाहर कराने का नाटक किया है। मुंबई, कल्याण-डोंबिवली, पनवेल, धुले सहित राज्य की कई मनपा और नगरपालिकाओं में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां तकनीकी कारणों, समय की देरी, दस्तावेजों की कथित कमी या एबी फॉर्म को लेकर आपत्तियां उठाकर उम्मीदवारों को बाहर किया जा रहा है। खास बात यह है कि इनमें बड़ी संख्या उन प्रत्याशियों की है, जिन्हें स्थानीय स्तर पर मजबूत माना जा रहा था और जो सीधे तौर पर भाजपा के लिए चुनौती बन सकते थे।

महायुति सरकार और चुनाव आयोग की मिलीभगत
विपक्षी दलों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष प्रशासनिक कार्रवाई कम और राजनीतिक रणनीति ज्यादा लग रही है। उनका कहना है कि उम्मीदवारों के आवेदन फॉर्म में शर्तें इतनी बड़ी संख्या में लागू किए जाने की जरूरत नहीं थी, लेकिन भाजपा नेतृत्व वाली महायुति सरकार और चुनाव आयोग की मिलीभगत से यह नियम जानबूझकर लागू किए गए, ताकि सोची समझी रणनीति के तहत विरोधी दलों के प्रत्याशियों के आवेदन की छंटनी की जा सके।

सत्ता हथियाने के लिए भाजपा की गंदी रणनीति
-विरोधी उम्मीदवारों को कमी दिखाकर किया जा रहा है बाहर

मुंबई में भी विरोधी दल के कुछ उम्मीदवारों को बाहर किए जाने का मामला सामने आया है। राजनीतिक जानकार संतोष शिंदे ने बताया कि भाजपा ने दो अपने तो विरोधियों के तीन गुना उम्मीदवारों को बाहर करने की राजनीति अपनाई है, ताकि उस पर आरोप भी न लगे और उसके विरोधी भी साफ हो जाएं।
भाजपा की गंदी रणनीति को लेकर कई शहरों में भी विपक्षी खेमे में असंतोष बढ़ता जा रहा है। कई उम्मीदवारों को अब मजबूरी में निर्दलीय चुनाव लड़ने या चुनावी मैदान से बाहर होने की नौबत आ गई है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर चुनाव से पहले ही इस तरह से मजबूत विरोधी मैदान से बाहर हो जाते हैं तो सीधा लाभ सत्ताधारी दल को मिलेगा। यही वजह है कि स्क्रूटिनीr की प्रक्रिया पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं और इसे लेकर आने वाले दिनों में राजनीतिक तापमान और बढ़ने की संभावना है।

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