अंदीजान का नौजवान मिर्जा, सन १४९९ ईस्वी। फरगाना की हसीन वादियों में हवा ठंडी थी, लेकिन अंदीजान के युवा शासक जहीरउद्दीन मोहम्मद बाबर के दिल में एक अजब सा बवंडर उठा हुआ था। उम्र महज सोलह वर्ष। सिर पर सल्तनत बचाने की जिम्मेदारी, पीठ पर दुश्मनों का साया और हाथों में नंगी तलवार। लेकिन इन तमाम जंगी मसरूफियतों के बीच, बाबर का मन किसी अनदेखे खिंचाव की तड़प में गिरफ्तार हो चुका था।
जंग के मैदान में फौलाद की तरह डटने वाला बाबर का जिगर किसी की एक झलक पाने के लिए मोम की तरह पिघल जाता था। वह शख्स था बाबरी, शाही बाजार का एक साधारण नवजवान, जिसकी मासूम आंखों में समरकंद की रातों जैसी खामोशी थी।
बाबर (अपने वफादार मुसाहिब कासिम बेग से): ‘कासिम! क्या तुमने कभी महसूस किया है कि इंसान का अपना दिल ही उसका सबसे बड़ा बागी बन जाए? मैं दुश्मनों के लश्कर से नहीं डरता, पर जब वह बाजार के मोड़ से गुजरता है, तो मेरी सांसें रुकने लगती हैं।’
कासिम बेग (चिंतापूर्वक): ‘मिर्जा! आप फरगाना के अमीर हैं। उजबेकों का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। यह वक्त शायरी या किसी राह चलते लड़के की दिल्लगी में खोने का नहीं है। सल्तनत को फौलादी इरादों की जरूरत है।’
बाबर (आह भरते हुए): ‘इरादे फौलाद के ही हैं कासिम! पर उस फौलाद को इस आतिश ने पिघला दिया है। मैं खुद को रोक नहीं पाता… जब वह सामने आता है, तो जुबान पर ताले लग जाते हैं और नजरें झुक जाती हैं।’
बाजार की वह पहली मुलाकात
एक शाम बाबर ने अपना शाही लिबास उतारकर एक साधारण कबा (चोगा) पहना और चेहरे को शॉल से ढककर अंदीजान के मुख्य बाजार की ओर निकल पड़ा। गलियों में इत्र, सूखे मेवों और ताजे पके कबाबों की खुशबू पैâली हुई थी। तभी रेशम की एक दुकान के सामने बाबर की नजर बाबरी पर पड़ी।
बाबरी अपने दोस्तों के साथ मुस्कुरा रहा था। उसकी मुस्कान बाजार के शोर-शराबे को चीरती हुई सीधे बाबर के दिल में उतर गई। बाबर हिम्मत जुटाकर आगे बढ़ा।
बाबर (धीमी आवाज में): ‘सुनो… क्या यह समरकंदी रेशम असली है?’
बाबरी (चमकती आंखों से मुड़ते हुए): ‘हुजूर, रेशम तो असली है, पर आप इस मामूली कपड़े में क्या ढूंढ रहे हैं? आपका लिबास सादा है, पर आपकी चाल बता रही है कि आप इस बाजार के आम खरीदार नहीं हैं।’
बाबर (नजरें चुराते हुए): ‘मैं तो बस कुछ तलाश करने निकला था। पर लगता है जो तलाशने निकला था, वह सामने होकर भी बहुत दूर है।’
बाबरी (मुस्कुराकर): ‘आप बातें बहुत अजीब करते हैं जनाब! अगर नाम बताने की जहमत उठाएं, तो शायद मैं आपकी तलाश आसान कर सकूं?’
बाबर: ‘नाम में क्या रखा है… मुझे लोग जहीर कहते हैं।’
बाबरी ने गंभीरता से बाबर को देखा। उसकी तेज नजर ने भांप लिया कि यह कोई आम सौदागर नहीं, बल्कि खुद उनके मिर्जा बाबर हैं। बाबरी ने तुरंत अपनी टोपी उतारी और अदब से झुक गया।
बाबरी (आदरपूर्वक): ‘माफ कीजिएगा हुजूर! मैं नादान था जो आपको पहचान न सका। फरगाना के अमीर मेरे सामने खड़े हैं और मैं गुस्ताखी कर बैठा।’
बाबर (घबराकर हाथ बढ़ाते हुए): ‘नहीं! झुकने की जरूरत नहीं है बाबरी! शहंशाह और अमीर दरबार के लिए होंगे… तुम्हारे सामने मैं सिर्फ एक तड़पता हुआ दिल हूं। आज के बाद मुझसे कभी झुककर बात मत करना।’
(तुजुक-ए-बाबरी/बाबरनामा के ऐतिहासिक प्रसंगों पर आधारित)
