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डॉलर `९५ पर, तेल भी महंगा!..रुपए की गिरावट ने अर्थव्यवस्था का बजट बिगाड़ा

-विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव कायम, कच्चे तेल का आयात, महंगाई और विदेशी कर्ज की लागत चिंता का विषय
-रुपए की गिरावट ने अर्थव्यवस्था का बजट बिगाड़ा
मुंबई। भारतीय रुपये पर दबाव मंगलवार को भी बना रहा। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग ९५.११५० के स्तर पर बंद होने की रिपोर्ट है। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने आयात पर निर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। रुपये की कमजोरी का सीधा अर्थ है कि एक डॉलर खरीदने के लिए अधिक भारतीय मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। इसलिए डॉलर और तेल दोनों महंगे होने पर आयात बिल बढ़ने का जोखिम रहता है। इसका प्रभाव केवल पेट्रोलियम कंपनियों तक सीमित नहीं है। परिवहन, विमानन, रसायन, उर्वरक और आयातित उपकरणों की लागत भी प्रभावित हो सकती है।
क्या हर चीज महंगी होगी?
कमजोर रुपया आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ा सकता है, लेकिन उपभोक्ता कीमतों में उसका प्रभाव अनेक कारकों पर निर्भर करता है। सरकारी कर, कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव भी महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर निर्यात करने वाली कंपनियों को डॉलर में प्राप्त आय का रुपये में अधिक मूल्य मिल सकता है। हालांकि आयातित कच्चे माल पर निर्भर निर्यातकों को लागत बढ़ने की चुनौती भी रहती है।
विदेशी निवेशकों की भूमिका
शेयर बाजार से विदेशी पूंजी निकलने पर डॉलर की मांग बढ़ सकती है। इससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। भारतीय रिजर्व बैंक विनिमय बाजार में अत्यधिक अस्थिरता रोकने के लिए आवश्यकतानुसार हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन रुपये का कोई स्थायी स्तर सुनिश्चित करना उसकी घोषित नीति नहीं है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि महंगे तेल के बावजूद वित्तीय अनुशासन, आयात प्रबंधन और महंगाई नियंत्रण के बीच संतुलन बनाए रखा जाए।
डॉलर की कीमत का असर केवल विदेशी मुद्रा बाजार में नहीं होता; अंततः उसका हिसाब परिवहन, उत्पादन और घरेलू बजट तक पहुंच सकता है। सवाल है कि इस दबाव को कम करने के लिए आर्थिक नीति कितनी तैयार है।

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