सामना संवाददाता / मुंबई
राज्य में महिलाओं पर अत्याचार से संबंधित ८० हजार से अधिक मामले जिला न्यायालयों में लंबित हैं। बच्चों पर अत्याचार के ६४ हजार ५७४ मामलों की सुनवाई भी काफी धीमी है। यह बात सामने आई है कि इन मामलों के निपटारे के लिए सरकार की उदासीन नीति जिम्मेदार है। महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार के मामले की सुनवाई लंबित रहने के दौरान विहार दुर्वे ने २०१३ में इस संबंध में जनहित याचिका दायर की थी।
इसकी सुनवाई करते हुए मुंबई हाई कोर्ट के जस्टिस मोहित शाह और जस्टिस एम.एस. सौनक ने फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना का आदेश दिया था, लेकिन सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया इसलिए २०१५ में फिर से सुनवाई हुई। जस्टिस आलोक आराध्ये और संदीप मरणे ने सरकार को १६ जून २०२५ तक राज्य में १७९ फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने का आदेश दिया। इस पर सरकार ने चुनाव का हवाला देते हुए पर्याप्त फंड न होने की बात कही। महिलाओं को न्याय मिलने में जहां पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों की कमी के कारण देरी हो रही है, वहीं सरकार फंड की कमी का भी हवाला दे रही है। राज्य में विभिन्न न्यायालयों में कुल ८० हजार से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें से सबसे अधिक ६४ हजार ९५ मामले जिला न्यायालयों में और २१ हजार ७२३ मामले सत्र न्यायालयों में लंबित हैं।
महिलाओं पर अत्याचार के मामलों के लिए केवल तीन महिला विशेष न्यायालय हैं। आयोग ने अत्याचारों को रोकने के लिए राज्य में छह शाखाएं शुरू करने की घोषणा की थी। इस पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है। यही कारण है कि वैशाली हगवणे जैसे मामले हो रहे हैं और अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं।
-विहार दुर्वे, याचिकाकर्ता
