शीतल अवस्थी
छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के परलकोट क्षेत्र में शिव की पूजा देखते ही बनती है। पारंपरिक रूप से छिंद के पेड़ पर चढ़कर शिव-पार्वती पूजन करने की परंपरा क्षेत्र में आज भी बरकरार है। माह भर तक चलने वाली यह पूजा बेहद कष्ट साध्य और जान जोखिम में डालने वाली होती है। बावजूद इसके भक्तगण यह पूजा परंपरा अनुसार, आज भी पूरे भक्तिभाव से करते हैं। इस महत्वपूर्ण पूजा को देखने आस-पास के ग्रामीण भी यहां बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। छिंद का पेड़ यहां के ग्रामीणों की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। छिंद रस ग्रामीणों की आय का जरिया है। एक छिंद के पेड़ से करीब चार हजार रुपए की आवक होती है। शायद यही वजह है कि यहां की पूजा परंपराओं में इसने अपना स्थान बना लिया है। शिव-पार्वती पूजा के दिन से महीने भर तक दो दर्जन से ज्यादा लोगों की टोली गांव-गांव नंगे पांव भजन-कीर्तन करते हुए भ्रमण करती है। इस दौरान टोली के सभी लोग गेरुए रंग का वस्त्र धारण किए रहते हैं। दिन भर सभी लोग उपवास करते हैं। गांव-गांव घूमने के दौरान भिक्षा के रूप में जो भी अनाज मिलता है, उसे रात को मिट्टी के पात्र में बिना तेल मसाले के सिर्फ उबाल कर भोजन बनाते हैं तथा सभी एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं। गांव का पूरा वातावरण इस दौरान धार्मिक भाव से ओत–प्रोत होता है। छिंद पेड़ के नीचे पहले पारंपरिक रूप से पूजन होता है। पूजन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। पेड़ के नीचे पूजन करने के बाद टोली के सदस्य कांटेदार पेड़ के ऊपर चढ़ते हैं तथा वहां भी पूजन करते हैं। इसके बाद पेड़ पर लगे छिंद फलों को तोड़ कर फेंका जाता है, जिसे नीचे खड़े श्रद्धालु प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। पेड़ के ऊपर पूजन करने चढ़ने वाले टोली के सदस्यों द्वारा पेड़ के ऊपर नृत्य भी किया जाता है। इस अनूठी परंपरा को आज भी बंग बहल गांवों में उत्साह पूर्वक लोग मनाते हैं। गर्मी के मौसम में होने वाले छिंद रस के सेवन से जहां प्यास बुझती है, वहीं थोड़ा नशा भी होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सल्फी के विकल्प के रूप में लोग छिंद रस का उपयोग करते हैं। शायद यही वजह है कि छिंद का शिव से यहां संबंध है। ग्रामीण वैवाहिक कार्यक्रमों सहित दीगर कार्यक्रम में मेहमाननवाजी के लिए छिंद रस का सेवन कराते हैं। हाट बाजारों में बड़ी मात्रा में छिंद रस का बाजार लगता है। ग्रमीण छिंद रस का सेवन पाचन क्रिया को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए भी करते हैं। छिंद रस का ग्रामीण क्षेत्रों में गुड़ भी बनाया जाता है। एक सीजन में एक पेड़ से डेढ़ महीने तक रस निकलता है। रस निकलने से पहले पेड़ों की बिक्री ग्रामीण कर देते हैं। रस के साथ-साथ फल का भी सौदा होता है।
