नीलम रामअवध / मुंबई
महाराष्ट्र में ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में बेतहाशा बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा चौंकानेवाली बात यह है कि लूटे गए पैसे की वापसी लगभग न के बराबर है। एक रिपोर्ट के अनुसार, २०१६ से २०२४ के बीच हजारों करोड़ रुपए ठगे जा चुके हैं, लेकिन राज्य में रिकवरी दर १ फीसदी से भी नीचे बनी हुई है।
बैंक फ्रॉड, फर्जी लोन ऐप, क्यूआर कोड स्कैम, क्रिप्टो और मैट्रीमोनियल ठगी जैसी नई-नई तकनीकों से साइबर अपराधियों ने लोगों की मेहनत की कमाई को मिनटों में चुरा लिया, परंतु अफसोस की बात है कि कानून, बैंक और पुलिस तंत्र मिलकर भी जनता को उसका पैसा वापस नहीं दिला सके।
प्रशासन की लापरवाही पर सवाल
बैंकों के पास फ्रॉड ट्रांजैक्शन को रोकने के लिए कोई तेज सिस्टम नहीं है। साइबर सेल के पास न पर्याप्त स्टाफ है, न आधुनिक टेक्नोलॉजी। जनता की शिकायतों पर कार्रवाई इतनी विलंब से होती है कि ठग तब तक पैसे निकालकर गायब हो जाते हैं।
जब सरकार डिजिटल इंडिया का सपना बेच रही थी, तब क्या उसे यह नहीं पता था कि इसके साथ साइबर सुरक्षा भी चाहिए? क्यों रीयल-टाइम फंड फ्रीज सिस्टम अब तक लागू नहीं हुआ? क्यों हर जिले में पर्याप्त साइबर क्राइम अफसर नहीं हैं?
फर्जी खातों का खुला खेल
साइबर ठग बेरोजगार युवाओं और छात्रों को पैसा देकर उनके बैंक खाते किराए पर लेते हैं। उन खातों से ठगी की रकम तुरंत दूसरे खातों या क्रिप्टोकरेंसी में भेज दी जाती है, लेकिन बैंक और पुलिस अधिकारी तब भी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं।
कब आएगा असरदार सिस्टम?
आज देशभर में करोड़ों लोग डिजिटल लेन-देन पर निर्भर हैं, पर क्या सरकार उन्हें सुरक्षा की गारंटी दे सकती है? क्या पुलिस और बैंकिंग सिस्टम को अपग्रेड करने का कोई ठोस प्लान है? या फिर यह मान लिया जाए कि ठगी के बाद पैसा वापस मिलना नामुमकिन है?
जनता खुद को असहाय महसूस कर रही है
हर बार यही कहा जाता है कि समय पर रिपोर्ट करें, लेकिन जब रिपोर्ट करने के बाद भी कोई परिणाम न निकले तो जनता क्या करे? अधिकांश पीड़ित या तो थाने के चक्कर काटते हैं या फिर हार मानकर नुकसान सह लेते हैं।
