महाराष्ट्र में मराठी एकता का लावा उबल पड़ा और फडणवीस सरकार को त्रिभाषा कानून वापस लेना पड़ा। यह सभी मराठी एकता की जीत है। मोदी सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाई और त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत कक्षा एक से स्कूली पाठ्यक्रम में हिंदी लागू करने का फैसला किया। इस फैसले का पूरे देश में विरोध हुआ। स्कूली शिक्षा में बच्चों की पीठ और दिमाग पर बोझ नहीं बढ़ना चाहिए। सरकार को पता होना चाहिए था कि यह बोझ उठाने की उनकी उम्र नहीं है, लेकिन हम उस सरकार से क्या उम्मीद कर सकते हैं, जिसका बोझ ही देश के लिए भारी हो गया हो? सवाल एक भाषा के रूप में हिंदी का विरोध करने का नहीं है। जिस सिनेमा जगत और संगीत की वजह से देश और दुनियाभर में हिंदी का प्रचार-प्रसार हुआ उस हिंदी सिने संगीत के पालनहार महाराष्ट्र में सरकार द्वारा हिंदी की अनिवार्यता और हिंदी थोपे जाने के खिलाफ मराठी माणुस एकजुट हो गया और फडणवीस सरकार को इस मुद्दे पर पीछे हटना पड़ा। दक्षिणी राज्य पहले ही केंद्र सरकार के इस त्रिभाषा फॉर्मूले को खारिज कर चुके हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और हरियाणा में हिंदी पहली भाषा है तो वहां तीसरी भाषा कौन-सी है? फिर इन लोगों को मराठी या तमिल, तेलुगु, मलयालम जैसी कोई तीसरी भाषा स्वीकार कर लेनी चाहिए। जब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के
गुजरात में ‘त्रिभाषा’ फॉर्मूला अस्वीकार
किया गया, वहां हिंदी को फॉर्मूले के हिसाब से स्वीकार नहीं किया गया है तो हिंदी को महाराष्ट्र पर लादने का दांवपेच कौन खेल रहा था और उसके लिए महाराष्ट्र पर कौन दबाव बना रहा था यह एक रहस्य ही है। इस तरह जबरदस्ती लादी जानेवाली भाषा का विरोध इतना जबरदस्त था कि लोगों ने शिवसेना, मनसे, कांग्रेस, राकांपा, वामपंथी दलों को एक साथ आकर विरोध करने के लिए मजबूर कर दिया।) इस आंदोलन में ‘ठाकरे’ के साथ आने से संयुक्त महाराष्ट्र संघर्ष की ताकत ५ जुलाई के मार्च में जरूर दिखाई देती। देश ने इस विशाल मार्च में महाराष्ट्र का मराठी बाना फिर देखा होता। वह न दिखाई दे, इसलिए सरकार ने हिंदी अनिवार्यता का आदेश वापस ले लिया। बेशक, अगर आदेश वापस भी ले लिया जाता है तो ५ जुलाई को विजयी शक्ति प्रदर्शन होगा। अब इस निमित्त के चलते इस बात की पुष्टि हो गई है कि मराठी एकता की घुड़दौड़ को कोई नहीं रोक पाएगा। हिंदी अनिवार्यता आदेश को रद्द करते हुए महाराष्ट्र सरकार ने ‘त्रिभाषा’ सूत्र का अध्ययन करने के लिए डॉ. नरेंद्र जाधव समिति की नियुक्ति की घोषणा की। यह निराधार और निरर्थक है। जब एक दफा महाराष्ट्र ने केंद्र सरकार द्वारा लादे गए त्रिभाषा सूत्र को अस्वीकार कर दिया है तो इन समितियों का क्या काम है? ये समितियां कौन-सा झंडा गाड़ने जा रही हैं? महाराष्ट्र की पहली भाषा मराठी ही रहेगी। दुनिया में आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी भाषा जरूरी है। अब तीसरी भाषा थोपने के बजाय इसे
अभिभावकों और छात्रों पर
छोड़ देना चाहिए। सरकार और उसकी समितियों द्वारा इस मामले में बेवजह उठा पटक कर भ्रम को और बढ़ाने की जरूरत नहीं है। छत्रपति शिवाजी महाराज की भाषा मराठी थी और छत्रपति ने मराठी की पवित्र तलवार उठाकर ‘स्वराज्य’ की स्थापना की। जो शिवराय की भाषा वही महाराष्ट्र की भाषा और वही शिक्षा के माध्यम का सूत्र होनी चाहिए, लेकिन भाजपा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम को लागू करके इस मुद्दे को मटियामेट करना है। जो लोग ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को आगे नहीं बढ़ा सके, जो लोग ट्रंप के दबाव में झुक गए, वे महाराष्ट्र में शिक्षा प्रणाली और बच्चों के भविष्य को बर्बाद करने के लिए ‘ऑपरेशन हिंदी’ थोपने जा रहे थे, लेकिन मराठी लोगों ने ऐसा नहीं होने दिया। महाराष्ट्र ने मराठी के तौर पर उछाल मारी और सरकार मुंह के बल गिर गई। इससे एक बार फिर साबित हो गया कि कोई भी महाराष्ट्र को मजबूर नहीं कर सकता। हिंदी राष्ट्रभाषा है या नहीं, यह बाद का विषय है, लेकिन आपको भाषा को थोपकर अपनी खाज मिटाने का अधिकार किसने दिया? यहां महाराष्ट्र में मराठी स्कूल बंद हो रहे हैं। उत्तर में हजारों की संख्या में हिंदी स्कूल बंद हो रहे हैं। शिक्षा की बदहाली और उसके कारण बेरोजगारों की कतारें देश के युवाओं की भयावह तस्वीर हैं। इस तस्वीर को बदलने के बजाय मोदी और फडणवीस सरकार ने कोमल बच्चों को हिंदी सीखने के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया है। फिलहाल, मराठी लोगों की एकता ने इस जुल्म को रोक दिया है। इस मराठी एकता को सलाम!
