प्रो. दयानंद तिवारी
‘जब दृष्टियां मर जाती हैं, तभी अंधायुग शुरू होता है’; यह पंक्ति केवल एक नाटक का संवाद नहीं, बल्कि उस विचारशील युगबोध की घोषणा है, जिसे धर्मवीर भारती ने अपनी लेखनी से जिया। २०वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हिंदी साहित्य को नई संवेदना, नई दृष्टि और नई दिशा देने वाले सर्जकों में यदि किसी एक नाम का चयन करना हो, तो वह धर्मवीर भारती होंगे, एक साथ कवि, कथाकार, नाटककार, संपादक, चिंतक और पत्रकार।
जन्म और व्यक्तित्व की छाया:
२५ दिसंबर १९२६ को प्रयाग की सांस्कृतिक भूमि में जन्मे धर्मवीर भारती की चेतना में आरंभ से ही साहित्य, दर्शन और सामाजिक सरोकारों का त्रिवेणी संगम था। उनका साहित्य न किसी एक वाद में कैद हुआ, न किसी सीमित समयधारा का अनुयायी रहा। वे छायावाद की भावुकता, प्रयोगवाद की बौद्धिकता और यथार्थवाद की सामाजिकता-तीनों को अपने में समाहित करने वाले लेखक थे।
साहित्यिक यात्रा की शुरुआत-कविता से संवाद
धर्मवीर भारती की साहित्यिक यात्रा कविता से प्रारंभ हुई। प्रेम, करुणा, धर्म, यथार्थ और आत्मसंघर्ष-उनके काव्य के मूल स्वर हैं। उन्होंने पौराणिक बिंबों को आधुनिक चेतना के साथ जोड़ा और ‘कनुप्रिया’ के माध्यम से राधा-कृष्ण की कथा को स्त्री-दृष्टिकोण से पुनर्परिभाषित किया।
प्रमुख काव्य संग्रह:
-कनुप्रिया-एक आधुनिक राधा की आवाज।
-ठंडा लोहा-युद्ध, हिंसा और संवेदनशीलता के द्वंद्व का चित्रण।
-सपनों के से दिन, सात गीत वर्ष-भावनाओं का कोमल बहाव।
‘मैं जानता हूं, प्रेम के देवता ने मुझे अभिशाप दिया है, फिर भी मैं उसी की मूर्ति गढ़ता हूं।’ यह केवल कविता नहीं, प्रेम में निहित त्याग और त्रासदी का दर्शन है।
उपन्यास-प्रेम और नैतिकता की अन्तर्दृष्टि:, धर्मवीर भारती के दो उपन्यास हिंदी साहित्य की अमर निधि माने जाते हैं।
१. गुनाहों का देवता
एक ऐसा उपन्यास, जो पीढ़ियों को रुलाता रहा है, सिखाता रहा है। चंद्रकांत और सुधा के माध्यम से प्रेम, त्याग, मर्यादा और समाज के मध्य संघर्ष को इतनी गरिमा से प्रस्तुत किया गया है कि यह उपन्यास संवेदना की पाठशाला बन गया।
‘सुधा, मैं तुम्हें चाहता तो हूं, मगर अपने नहीं समाज के नियमों से डरता हूं।’
२. सूरज का सातवां घोड़ा
यह उपन्यास शैली और शिल्प की दृष्टि से अद्वितीय है। इसमें कहानी के भीतर कहानी की रचना है, जहां समय, सत्य और व्यक्ति के विभिन्न रूपों को गहनता से उकेरा गया है।
नाटक- `अंधायुग’ और आधुनिकता की त्रासदी:
‘अंधायुग’ धर्मवीर भारती की सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है। यह केवल एक नाटक नहीं, बल्कि आधुनिक समाज की आत्मा पर लिखी गई टिप्पणी है। महाभारत की कथा के माध्यम से युद्ध के बाद की नैतिक विडंबनाएं, आत्म-ग्लानि और मूल्य-संक्रमण की त्रासदी को भारती ने अत्यंत मार्मिकता से प्रस्तुत किया।
‘जब दृष्टियां मर जाती हैं, तभी अंधायुग शुरू होता है।’
धृतराष्ट्र केवल दृष्टिहीन राजा नहीं, वह हर सत्ता है जो देखना नहीं चाहती।
निबंध, डायरी और चिंतन:
धर्मवीर भारती ने लेखनी को आत्मान्वेषण का माध्यम भी बनाया। ‘ठेले पर हिमालय’ जैसी कृति एक बौद्धिक आत्मा की संवेदनात्मक यात्रा है। उसमें वह हिमालय नहीं जो पर्वत है, बल्कि वह जो संकल्प, विवेक और मूल्य का प्रतीक है। उनकी डायरी और निबंधों में विचारशीलता की एक ऐसी धारा प्रवाहित होती है, जो पाठक को केवल पढ़ने नहीं, सोचने के लिए भी बाध्य करती है।
पत्रकारिता-धर्मयुग का युग:
धर्मवीर भारती का नाम ‘धर्मयुग’ साप्ताहिक पत्रिका से भी अमर है। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को विचारशीलता, संतुलन और सामाजिक उत्तरदायित्व की धार दी। वे संपादक नहीं, ‘संपादक का विवेक’ थे। धर्मयुग उनके संपादन में केवल पत्रिका नहीं, रचनात्मक आंदोलन बन गया। आज भी पूरे देश में उनके साथ और उनकी छाया में पली और बनी पत्रकारिता की एक पीढ़ी मौजूद है।
साहित्य की विशेषताएं:
१.मिथकीयता और आधुनिकता का समन्वय
-कृष्ण, युधिष्ठिर जैसे पौराणिक पात्रों में आधुनिक मनुष्य की विडंबना।
२. काव्यात्मक भाषा
-गद्य में भी कविता का सौंदर्य, प्रवाह और गहराई।
३.नैतिकता की खोज
-उनके पात्र नैतिक संकट से गुजरते हैं, आत्ममंथन करते हैं।
४. प्रयोगधर्मिता
-नाटक और उपन्यास में शैलीगत नवीनता।
५.दुख और करुणा का कलात्मक उद्भव
-युद्ध, प्रेम, विछोह और व्यवस्था की क्रूरता को मानवता की रोशनी में रखा।
प्रेरणादायी पंक्तियां:
‘मनुष्य वही जो मनुष्य के लिए मरे और वो मौत मौत नहीं, जो जीवन के लिए न जिए।’
— अंधायुग
‘बात ये नहीं कि मैं अकेला हूं,
बात ये है कि
मैं अकेले चल पड़ा हूं।’
-ठंडा लोहा
सम्मान और प्रतिष्ठा:
-पद्मश्री पुरस्कार (१९७२)
-सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार
-भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार
हिंदी अकादमी पुरस्कार,
साहित्य अकादमी की सदस्यता।
धर्मवीर भारती एक युग का नाम है—एक ऐसी लेखनी जो करुणा की नर्म स्याही से मानवता के पृष्ठ पर मूल्य, विवेक और प्रेम लिखती रही। उनके साहित्य में विचार है, समर्पण है, विरोध है और सबसे बढ़कर मनुष्य होने की पीड़ा है। वस्तुत: आज जब शब्दों की बाजारू चमक और विचारों की खोखली गूंज हर ओर है, धर्मवीर भारती की रचनाएं दीपशिखा की तरह हमारे भीतर जलती हैं-शांत, स्थिर, लेकिन परिवर्तनकारी। आज भी।
(लेखक आचार्य एवं शोध निदेशक, श्री जे.जे.टी. विश्वविद्यालय व सुप्रसिद्ध शिक्षाविद, साहित्यकार एवं राष्ट्रवादी विचारक है)
