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हरि बोल : एक खिसका हुआ लेखक

डॉ. हरि जोशी
एक मित्र ने फेसबुक पर बड़ी सार्थक टिप्पणी की। उन्होंने एक पोस्ट में लिखा कि ‘हरि जोशी आदमी तो अच्छा है, किंतुु खिसका हुआ है।’ सच मानिए इस सद्विचार को पढ़कर ८२ वर्ष की उम्र में उछलने का मेरा मन हुआ, किंतुु हाथ-पांव कमजोर हो जाने के डर से मन में ही प्रफुल्लित हुआ।’
‘उन्होंने सही लिखा कि लेखक खिसका हुआ है, जिसने अनेक ऊटपटांग काम किए।’ उसे मंत्रियों की प्रत्येक कार्रवाई को शिरोधार्य करते हुए, बिना एक इंच खिसके हुए सिसकते रहना चाहिए था।
मित्र को ज्ञात नहीं, इस दुर्लभ गुण के कितने लाभ हैं? ‘जिसको ज्ञात हो जाता है कि सामने वाला खिसका हुआ है, वह संभलकर बात करता है।’ इसके मुंह कौन लगे, खिसका हुआ है, अपना गला न पकड़ ले?‘
एक अंग्रेजी कहावत है, `ए रुलिंग स्टोन गेदर’ भारत में मो को बहुधा मास कहा जाता है, मो का अर्थ काई से है, जिसे निमाड़ी, मालवी लोकभाषा में ‘कजी’ बोला जाता है, अर्थात यदि लुढ़कने वाला पत्थर कीचड़ में अधिक समय के लिए पड़ा रहे तो उसके आस—पास काई (कजी) जम जाती है, फिर स्वयं वह अपनी जगह से हिल-डुल नहीं सकता। विभिन्न सरकारों की मुझ पर बड़ी कृपा रही कि वे बार-बार मुझे लुढ़काती रहीं। मेरे आस-पास काई नहीं जमने दी। सेवानिवृत्ति के बाद खुद ही कोशिश करता रहता हूं कि थोड़ा-थोड़ा प्रतिदिन खिसकता रहूं। पहला नेता मुझे खिसकाने के चक्कर में था। दांव ऐसा पड़ा कि राजनीति से खुद को ही खिसकना पड़ा। मेरी उस रचना ने उसकी राजनीतिक बलि ले ली।
कई बार ऐसा हुआ कि इधर मेरी कोई रचना प्रकाशित हुई कि मुझे दूसरे शहर खिसका दिया गया। सरकार की कृपा से प्रतिवर्ष नियम से लगभग हर साल मुझे लुढ़काया जाता रहा। सरकार ने इस खिसके हुए लेखक को कितने शहरों में खिसकाया, उसे ही याद नहीं। किसी को क्या मालूम, बचपन में मेरे गांव में घुमंतू प्रजाति के लोग एक बड़ी बैलगाड़ी यानी पांजरी पर पूरी गृहस्थी लादकर चलते थे। जब मैं छुट्टियों में गांव जाता तो बच्चों को दिखा देता था, ‘इन्हें देख लो, तुम्हारा बाप खिसका हुआ है, जिसे जीविकोपार्जन के लिए घुमंतू प्रजाति का गदड़िया सरकार ने बना रखा है।‘ बिच्छू का डेरा पीठ पर। प्रतिवर्ष भटकना अपनी नियति थी। यह अलग बात है कि बिच्छू भी डंक मारने का अपना धर्म नियम से निभाता था। १९८० और २००२ में ऐसे दो तबादलों पर अदालतों से स्थगनादेश प्राप्त किए। ऐसी असामान्य गतिविधि कोई खिसका हुआ आदमी ही कर सकता है?
आदत का मारा खिसकते-खिसकते अब बार-बार अमेरिका आ जाता है। खिसके हुए व्यक्ति के लाभ उठाता हूं। इसी गुण के कारण उसके बच्चे, नाती-पोते सब उसका बहुत ध्यान रखते हैं। संभालकर रखते हैं, बुढ़ापा है, यह खिसका हुआ प्राणी जल्दी ही खिसक न जाए?
अपनी अनेक प्रकाशित पुस्तकों में मैंने इन दुर्लभ सम्मानों का उल्लेख किया है, जिसे भाई जय प्रकाश मानस ने एक पुस्तक से उठाकर फेसबुक पर डाल दिया। जिस पर उत्तर देते हुए एक मित्र ने मेरे ‘खिसके हुए होने की‘ पुष्टि की।

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