मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : न्या. नागरत्ना, धन्यवाद!

संपादकीय : न्या. नागरत्ना, धन्यवाद!

‘सत्यमेव जयते’ हमारे भारत के इस ध्येय वाक्य को मोदी सरकार ने झूठा साबित कर दिया है। देश की न्याय व्यवस्था का जिस प्रकार से अधोपतन पिछले दस वर्षों में हुआ है, उस पर बोलनेवाला कोई नहीं है। प्रत्येक भारतीय को तीन बच्चे होने चाहिए और कौन, कब सेवानिवृत हो, इस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख श्री मोहन भागवत प्रवचन देते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था का रोज हो रहा अधोपतन उन्हें विचलित नहीं करता। भारत के सर्वोच्च न्यायालय में दो नए न्यायमूर्तियों ने शपथ ली। इन दो न्यायमूर्तियों में से एक न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की नियुक्ति पर कई प्रख्यात विधिवेत्ता और पूर्व न्यायधीशों ने आपत्ति जताई। सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नति और नियुक्ति करनेवाला जो ‘कोलेजियम’ है, उसमें शामिल मौजूदा न्यायधीश बी. वी. नागरत्ना ने न्यायमूर्ति पंचोली की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति को असंवैधानिक और गलत परंपरा शुरू करनेवाला बताया और अपनी नाराजगी लिखित रूप में जाहिर की है। न्या. पंचोली को कई वरिष्ठ न्यायाधीशों को दरकिनार कर सुप्रीम कोर्ट में बैठाया गया। वरिष्ठता की सूची में न्या. पंचोली ५७वें क्रमांक पर हैं। पंचोली का मूल और संबंध गुजरात की धरती से है। २०२३ में न्यायमूर्ति पंचोली की गुजरात से पटना उच्च न्यायालय में बदली की गई थी। वह बदली भी उस समय विवादों में घिरी थी। अब न्यायमूर्ति पंचोली को सुप्रीम कोर्ट में भेजने से सर्वोच्च न्यायालय का प्रादेशिक संतुलन बिगड़ गया है। कई वरिष्ठ न्यायमूर्तियों पर खुला अन्याय हुआ है और कोलेजियम की विश्वसनीयता पर आघात पहुंचा है। न्या. नागरत्ना ने अत्यंत साहसपूर्वक इस प्रक्रिया का विरोध किया। उन्होंने न्यायमूर्ति पंचोली को सुप्रीम कोर्ट में लाने के निर्णय पर अपनी असहमति खुलकर व्यक्त की। यह मानो घोर काले अंधकार में
एक आशा का दीप
जलने जैसा है। संक्षिप्त में, न्यायमूर्ति पंचोली की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं हुई, बल्कि उसके पीछे राजनीतिक दबाव और सरकार का हस्तक्षेप मुख्य कारण रहा है। साल २०३३ में जब न्यायमूर्ति पंचोली इसी तरह नियमविरुद्ध तरीके से देश के मुख्य न्यायाधीश बनेंगे, तब देशवासी उनसे वैâसे न्याय की अपेक्षा करेंगे? यह मामला देश की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप और मनपसंद न्यायाधीशों की नियुक्ति का है। न्यायमूर्ति पंचोली ने जब शपथ ली तो न्यायाधीशों, वकीलों और विधिवेत्ताओं ने तालियां बजाईं। शपथ क्या थी? ‘भय और पक्षपात, प्रेम या द्वेष की भावना से काम नहीं करूंगा।’ लेकिन न्याय व्यवस्था की पवित्रता को बनाए रखने के लिए इस पूरे घटनाक्रम में निर्भय होकर जो एकमात्र शख्सियत खड़ी रही, उनका नाम है न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना। महिला होते हुए भी वह बिजली की तरह चमकते हुए खड़ी रहीं और अपनी मर्यादा का पालन करते हुए इस असंवैधानिक कृत्य पर असहमति जताई। न्यायालय के आधार पर भारतीय लोकतंत्र खड़ा है। उसके स्तंभों को मौजूदा सत्ताधारी खोखला कर चुके हैं और अब वे उन स्तंभों को उखाड़ने पर तुले हैं। क्या सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट राजनीतिक नौटंकी बन चुके हैं? अगर ऐसा नहीं होता तो कल तक भाजपा में प्रवक्ता पद पर काम कर रही एक महिला को मुंबई हाई कोर्ट की न्यायाधीश नियुक्त नहीं किया जाता। ऐसी नियुक्तियों के लिए राजनीतिक दबाव स्वीकार करना कोलेजियम के नियम का सीधा-सीधा उल्लंघन है। लाखों लोगों का भविष्य हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के मुकदमों में अटका रहता है। शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को अमित शाह ने असंवैधानिक तरीके से तोड़ा, फूट डालकर दल-बदल को बढ़ावा दिया। मूल पार्टी और चिह्न भी चोरों को सौंप दिए गए। और हमारा सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई नहीं कर रहा और
तारीख पर तारीख
दे रहा है, क्योंकि वहां भी ‘पंचोली’ बैठे हैं। कोर्ट में तारीख पर तारीखें मिलती रहती हैं, गैरजरूरी मामलों में न्यायमूर्ति समय गंवाते रहते हैं और इस देश का सर्वोच्च न्यायालय भी ऐसा है कि बड़े लोगों के लिए ये न्यायाधीश रात में उठकर सुनवाई करते हैं, स्थगन आदेश देते हैं और जमानत भी दे देते हैं। देश की पूरी न्याय व्यवस्था भ्रष्टाचार के कीचड़ में फंसी हुई है। अगर इसे बाहर नहीं निकाला गया तो इस देश का लोकतंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अन्य मौलिक अधिकार ही खत्म कर दिए जाएंगे। आपातकाल के समय इंदिरा गांधी सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप करती थीं, ऐसा भाजपावाले कहते हैं। तो भाजपावालों को भी वैसा करने का अधिकार भारतीय संविधान ने नहीं दिया है? १९७३ में इंदिरा गांधी ने न्यायमूर्ति ए. एन. रे को सीधे भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। उस समय न्यायमूर्ति शेलाट, न्यायमूर्ति के. एस. हेगड़े और न्यायमूर्ति ए. एन. ग्रोवर ये तीनों उनसे कहीं अधिक वरिष्ठ थे। इनकी वरिष्ठता को दरकिनार करके जब न्यायमूर्ति रे को मुख्य न्यायाधीश बनाया गया, तब शेलाट, हेगड़े और ग्रोवर ने खुलकर अपनी नाराजगी जताई और न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया था। न्याय व्यवस्था का अधोपतन तब हुआ और जनसंघ ने उस पर सवाल उठाए थे! आज ‘भाजपा वही अपराध कर रही है और इस सरकार ने सवाल पूछने वालों को देशद्रोही बताकर जेल में डालने की व्यवस्था पहले ही कर दी है। मोदी-शाह के दौर में कई राजनीतिक और सार्वजनिक अपराध हुए हैं। भविष्य में जब ये सभी मुकदमे सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति पंचोली के सामने आएंगे तो वे क्या करेंगे? गांधारी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन को बचाने के लिए केवल एक बार आंखों की पट्टी खोली थी। उसी तरह ‘न्यायदेवी’ को भी देश और लोकतंत्र को बचाने के लिए करना चाहिए। एक बार आंखों की पट्टी हटानी चाहिए। चारों तरफ पैâले अंधकार को एक बार देखना चाहिए! न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इस घोर अंधकार में रोशनी की किरण दिखाई है, इसके लिए देश उनका सदैव आभारी रहेगा।

अन्य समाचार