मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : पितृपक्ष में चुनाव... कौन बनेगा भारत का उपराष्ट्रपति!

संपादकीय : पितृपक्ष में चुनाव… कौन बनेगा भारत का उपराष्ट्रपति!

नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करती है। कम से कम हिंदू वोटों के लिए, वे ऐसा करते दिख रहे हैं। वे शुभ समय, मुहूर्त, पंचांग आदि का पालन करते हैं। हिंदू परंपरा के अनुसार, पितृपक्ष की अवधि के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है, लेकिन भारत के उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव पितृपक्ष के दौरान हो रहा है। अब तक, भाजपा पुरस्कृत चुनाव आयोग ने भी मोदी-शाह द्वारा निर्धारित मुहूर्तों पर सभी चुनाव कराए हैं, लेकिन देश के उपराष्ट्रपति का चुनाव करने के लिए सभी ने पितृपक्ष का मुहूर्त चुना है। विशेष रूप से एनडीए के उम्मीदवार सी. पी. राधाकृष्णन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुराने कार्यकर्ता और प्रखर हिंदुत्ववादी हैं इसलिए यह मुहूर्त आश्चर्यजनक है। पिछले उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को मोदी-शाह ने आनन-फानन में इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया था। यह झूठ है कि धनखड़ ने स्वस्थ का कारण बताया। धनखड़ बिल्कुल स्वस्थ्य थे। उनके इस्तीफे के एक महीने बाद भी किसी ने अपने पूर्व उपराष्ट्रपति को नहीं देखा है। वे कहां हैं इस बात पर चर्चाएं चल रही थीं। खबर आई कि धनखड़ अभी दिल्ली से २४ किलोमीटर दूर गदाईपुर इलाके के एक फार्महाउस में हैं। यानी वे किसी अज्ञात जगह पर हैं। धनखड़ अभी भी पूरी तरह से पहरे में हैं। यहां तक कि उनके रिश्तेदारों को भी उनसे मिलने की इजाजत नहीं दी जा रही है। यह पूर्व उपराष्ट्रपति के मामले में हो रहा है इसलिए नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति को बेहद सावधान रहना चाहिए। बेशक, अगर उपराष्ट्रपति को गायब होता नहीं देखना चाहते या ऐसा नहीं चाहते कि स्वास्थ्य के झूठे आधार पर दबाव में आकर वे इस्तीफा दें, तो
लोकतंत्र और स्वतंत्रता के
पक्षधर सांसदों को सभी विपक्षी दलों के उम्मीदवार पूर्व न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी को वोट देकर विजयी करना चाहिए। उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए संसद के दोनों सदनों के सदस्य मतदान करते हैं। लोकसभा और राज्यसभा के ७८१ सदस्य मिलकर मतदान करेंगे। चुनाव सी. पी. राधाकृष्णन और पूर्व न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी के बीच होगा। उपराष्ट्रपति पद के लिए पहली बार इतना जबरदस्त मुकाबला हो रहा है। भाजपा के पास अपना बहुमत नहीं है इसलिए उसे सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ेगा। भाजपा स्थानीय निकायों से लेकर लोकसभा तक सभी चुनाव व्यवस्था का दुरुपयोग और थैलों के दम पर लड़वाती है और चुनाव प्रणाली पर नियंत्रण कर लेती है। उपराष्ट्रपति एक संवैधानिक पद है। यदि इस चुनाव में अन्य सांसदों के वोट तोड़ने के लिए खरीदने के प्रलोभन दिखाए जा रहे हैं तो यह शर्मनाक है, लेकिन नैतिकता, लाज आदि का रिश्ता दस साल पहले भाजपा की राजनीति से टूट चुका है। अगर वे कहते हैं कि मोदी और उनकी पार्टी के पास पर्याप्त बहुमत है तो इस जोड़-तोड़ की क्या जरूरत है? यही सवाल है। कारण यह है कि भाजपा में सबकुछ ठीक नहीं दिख रहा है। फिलहाल, तानाशाह घबराया हुआ है। यदि तानाशाह मन से अस्थिर हो जाता है तो उसका असर सबसे पहले उसके बनाए गुलामों पर होता है। गुलामों में स्वतंत्रता और स्वाभिमान की भावना जागृत होती है। आज कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है। तानाशाह ने एक उपराष्ट्रपति को गायब कर दिया है और दूसरे उपराष्ट्रपति का चुनाव चल रहा है इसलिए यह मतदान सोच-समझकर और राष्ट्रहित में होना चाहिए। सांसदों को चाहिए कि वे मतदान दलीय निष्ठा से ज्यादा राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर करें। विपक्षी उम्मीदवार पूर्व न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी की यह अपील कि अपने प्रिय राष्ट्र और अपनी
आत्मा की आवाज
सुनना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है, आज की सच्चाई है। दूसरी ओर, महाराष्ट्र के राज्यपाल (जो मोदी-शाह के उम्मीदवार हैं) सी. पी. राधाकृष्णन के अपने ऐसे विचार और सोच नहीं हैं। राधाकृष्णन सिर्फ यही कहते हैं कि मोदी कितने महान हैं और मोदी ने देश को कितना महान बना दिया है। मोदी के कार्यकाल में प्रमुख संवैधानिक पदों पर भ्रष्ट लोगों की नियुक्ति से देश को बहुत नुकसान हुआ है। इसमें किसी का अपमान करने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन इस तथ्य से वैâसे इनकार कर सकते हैं कि सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर लोगों को इसी नीति के साथ चुना और नियुक्त किया गया है, वे उनकी जी-हुजूरी करें? मोदी और उनके लोगों को लगता है कि ऐसे पदों पर बैठे लोग उनके ‘उठ’ कहने पर उठें और ‘बैठ’ कहने पर बैठ जाएं इसलिए कोई भी रीढ़ वाला व्यक्ति, स्वाभिमानी इंसान उन्हें पसंद नहीं। उपराष्ट्रपति धनखड़ जब तक झुके रहे, पद पर बने रहे। जैसे ही धनखड़ ने थोड़ा सीधा खड़ा होने की कोशिश की, उनका ‘बंदोबस्त’ कर दिया गया और हमेशा के लिए गायब कर दिया गया। जब तक धनखड़ के सार्वजनिक रूप से दर्शन नहीं होते, तब तक यही कहना पड़ेगा। धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद और दिल्ली भी छोड़ना पड़ा। राधाकृष्णन का चयन नए उपराष्ट्रपति को भविष्य में वैâसा व्यवहार करना है, इसका प्रशिक्षण देने के बाद ही किया गया होगा। इस समय देश में क्या हो रहा है, यह कोई निश्चितता से नहीं कह सकता। खुद को महान हिंदुत्ववादी माननेवालों की सरकार है और उन्होंने पितृपक्ष के मुहूर्त पर उपराष्ट्रपति पद का चुनाव रखा है। क्या यह कहा जा सकता है कि मोदी ने धर्मातीत राजनीति शुरू की और उनकी पार्टी चीन से जुड़ाव के कारण धर्मनिरपेक्षता और सेक्युलरवाद की ओर झुक रही है? फिलहाल, पितृपक्ष में ‘कौन बनेगा उपराष्ट्रपति’ यही सवाल है!

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