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जनता की जान पर ‘ठेका का खेल’…निकम्मी नीति से पंगु हुआ कूपर अस्पताल!

-नर्सें गेट पर भीड़ संभालें या ऑपरेशन थिएटर?

-आज भी खाली हैं ३०० पद

-मूकदर्शक बने महायुति सरकार और प्रशासन

सामना संवाददाता / मुंबई

मुंबई की जनता की जान पर ‘ठेका का खेल’ मनपा खेल रही है। मनपा और महायुति सरकार की निकम्मी और बेपरवाह नीति के कारण जुहू का कूपर अस्पताल पंगु होकर ध्वस्त व्यवस्था का प्रतीक बन गया है। हालात ऐसे हैं कि नर्सों को यह तय करना पड़ रहा है कि वे अस्पताल के गेट पर भीड़ संभालें या ऑपरेशन थिएटर में मरीजों की जान बचाएं। ३०० से ज्यादा मंजूर पद के बावजूद अस्पताल संकट से जूझ रहा है। हालांकि, इन सब पर मूकदर्शक बनी महायुति सरकार और मनपा प्रशासन जनता की पीड़ा पर आंख मूंदकर बैठा है।
मुंबई के जुहू स्थित मनपा का डॉ. आर.एन. कूपर अस्पताल इन दिनों भारी अव्यवस्था से जूझ रहा है। इस अस्पताल में सालों से करीब ३०० पद खाली पड़े हैं। डॉक्टरों, नर्सों, पंजीकरण क्लर्कों और तकनीशियनों की भारी कमी ने हालात बिगाड़ दिए हैं। मनपा के अधीन यह अस्पताल ठेका कर्मचारियों पर टिका है। कई बार उन्हें तिहरी शिफ्ट करनी पड़ती है। हाल ही में १५ ठेका कर्मचारियों का ठेका समाप्त होते ही मरीज पंजीकरण सेवाएं ठप हो गर्इं और नर्सों को अस्पताल के गेट पर लगी कतारें संभालनी पड़ीं।
मरीजों की जान पर खतरा
इस स्टाफ संकट ने आपातकालीन सेवाओं पर भी गंभीर असर डाला है। पश्चिमी उपनगर से लेकर एयरपोर्ट और एक्सप्रेस-वे पर दुर्घटना के मामलों तक हर स्थिति का दबाव कूपर अस्पताल पर रहता है। लेकिन मजबूरी में ठेका मजदूरों पर बोझ डालकर मनपा ने खुद ही मरीजों की जान दांव पर लगा दी है।
दिव्यांग मरीज तक परेशान
स्टाफ की कमी का असर दिव्यांग मरीजों पर भी पड़ा। हाल ही में दिव्यांगता ओपीडी सेवाओं को मजबूरी में दो हफ्तों के लिए नए पंजीकरण बंद करने पड़े। नतीजतन, चंद्रशेखर रोहिदास जैसे आंशिक दृष्टिबाधित मरीजों को यूनिक डिसेबिलिटी आईडी के लिए भायखला स्थित जेजे अस्पताल का चक्कर लगाना पड़ा।
मनपा और सरकार पर सवाल
फिलहाल, मनपा अस्थाई कर्मचारियों से काम चला रही है, लेकिन यह व्यवस्था टूटने के कगार पर है। स्थाई नियुक्तियां टालकर प्रशासन ने संकट और गहरा कर दिया है। सवाल यह है कि ३०० पद खाली रखने और ठेका कर्मचारियों का शोषण करनेवाली मनपा और महायुति सरकार मरीजों की जान से कब तक खिलवाड़ करती रहेगी।

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