मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : आइए, हमारे यहां स्वाभिमान का सुन्नत किया जाता है!

संपादकीय : आइए, हमारे यहां स्वाभिमान का सुन्नत किया जाता है!

राजनीति अब पूरी तरह से भरोसे के बाहर हो चुकी है। फिर भी, राजनीति में किसी पुरुष का भाग्य कब चमक जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। पश्चिम बंगाल में तो इस समय ऐसे भाग्योदय का अजीर्ण हो गया है। ‘नेशनलिस्ट सिटीन्जस पार्टी ऑफ इंडिया’ नाम की इस खोखली पार्टी की ऐसी लॉटरी लगी कि रातों-रात उसे बैठे-बिठाए २२ ‘रेडीमेड’ सांसद मिल गए। अब तक इतने सांसद न तो कभी शिवसेना को मिले, न शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस को नसीब हुए। कई राजनैतिक दल तो ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी खपा दी, पर वे एक अदद विधायक या सांसद तक नहीं चुनवा पाए। एडवोकेट प्रकाश आंबेडकर, रामदास आठवले और केजरीवाल जैसे बड़े-बड़े सूरमा जो नहीं कर पाए, वो त्रिपुरा की इस ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ ने कर दिखाया। भारतीय लोकतंत्र का यह अनोखा चमत्कार प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और देश के चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की ‘तपस्या’ का ही नतीजा है। यह ‘पार्टी’ असल में त्रिपुरा की है। त्रिपुरा में लोकसभा की कुल ताकत ही सिर्फ दो सीटों की है; मगर इस त्रिपुरी पार्टी के अब पूरे २२ सांसद लोकसभा में दिखाई देंगे, जो प्रधानमंत्री मोदी के सामने ‘जी हुजूर’ और ‘हां में हां’ मिलाने का काम करेंगे। इसे कहते हैं ‘ऊपरवाला जब भी देता, देता छप्पर फाड़ के।’ बिना मांगे झमाझम बरसता है और जब इंसान ‘ना-ना’ कहता रहे, तब भी झोली भर देता है; इस मामले ने यही साबित किया है। यह जो भी NCPI नाम की गुमनाम-सी पार्टी है, इसके अध्यक्ष श्रीमान उत्तिया कुंडू खुद कभी जिंदगी में विधायक, सांसद या एक अदद नगरसेवक तक नहीं बन पाए। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में तो उन्हें पूरे राज्य से कुल जमा ८६२ वोट मिले थे। पश्चिम बंगाल में वे चार सीटों पर लड़े और उन्हें ‘नोटा’ से भी कम वोट नसीब हुए। हावड़ा की किसी तंग गली के नुक्कड़ पर इस पार्टी के बेंच मार्क दफ्तर का रजिस्ट्रेशन है, जहां कुल मिलाकर एक टूटी हुई बेंच पड़ी है। अब यह टूटी बेंचवाली पार्टी रातों-रात पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा सांसदों वाली पार्टी बन बैठी है। मजेदार बात देखिए कि खुद पार्टी के मुखिया उत्तिया कुंडू को भनक तक नहीं थी कि उन्हें अचानक २०-२२
रेडीमेड सांसदों की ‘लॉटरी’
लग गई है। इसीलिए कुंडू बाबू खुद हक्के-बक्के, भौचक्के और चकराए हुए हैं। सांसदों की यह ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ अचानक उनकी पार्टी में हो गई, जिससे वे डरे हुए हैं। वैसे उन्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है। तृणमूल कांग्रेस के जितने भी डरपोक, स्वार्थी और बिकाऊ सांसद थे, वे कुंडू जी की गली वाली पार्टी में खुद का विलय करके एकदम हल्के हो गए हैं। यह भारतीय राजनीति की ‘गटरगंगा’ का सबसे स्याह और काला अध्याय है। ‘चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस का नामोनिशान भी नहीं बचेगा’ कोलकाता में अमित शाह और शुभेंदु अधिकारी जैसे लोगों ने जो ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ की थी, उसे उन्होंने सचमुच अमली जामा पहनाकर दिखा दिया। ममता बनर्जी की पार्टी में सारे के सारे भगोड़े, बुजदिल और बिकाऊ लोग भरे पड़े थे। ‘मां, माटी, मानुष’ जैसी बंगाली अस्मिता की उनकी तमाम हुंकारें खोखली थीं। इन भगोड़ों को न तो ममता से कोई प्रेम था और न ही बंगाल की अस्मिता से कोई प्यार। एक अदद हार क्या हुई, ये ताश के पत्तों के महल की तरह ढह गए और सूखे पत्तों की तरह उड़ गए। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो ममता बनर्जी के साथ ३०-३५ सालों से काम कर रहे थे। खुद ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की सियासत में खून-पसीना बहाया, यह सच है; मगर ये जो विधायक-सांसद भाग खड़े हुए हैं, इन्होंने बिना किसी संघर्ष के मलाईदार पद पाए थे और अब मुसीबत आते ही दुम दबाकर भाग निकले। ऐसे में कल्याण बनर्जी, सौगत राय, डेरेक ओ’ब्रायन, सागरिका घोष, शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद और महुआ मोइत्रा जैसे वफादार लोगों की तारीफ करनी होगी। ममता बनर्जी ने अपने इर्द-गिर्द कितने खोखले और कमजोर मोहरे खड़े कर रखे थे, यह अब साफ दिख रहा है। खैर, आजकल सत्ता के बाजार में इन्हीं बेईमानों के ‘भाव’ बढ़े हुए हैं। यह मंजर हर तरफ दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र में शरद पवार ने जिन्हें नेता बनाया, मंत्री पद सौंपे, वही सबसे पहले भाग खड़े हुए और श्री उद्धव ठाकरे ने जिन्हें मंत्री बनाकर सबकुछ न्योछावर कर दिया, वही सबसे पहले गद्दार निकले। राजनीति में पहले इंसानों की परख होती थी, आज तो ‘सब घोड़े बारह टके’ के हिसाब से
पदों और सत्ता की खैरात
बांटी जा रही है। इन लोगों की न कोई निष्ठा है, न कोई विचारधारा और न ही कोई स्टैंड। जिधर की हवा देखी, उधर के ‘आयाराम-गयाराम’ बन गए। ऐसे ‘आयाराम-गयारामों’ को मेडल बांटने का धंधा दिल्ली दरबार में बाकायदा व्यापारिक तौर-तरीके से चल रहा है। उस दरबार में जाकर एक बार अपना जमीर और स्वाभिमान गिरवी रख दो, फिर तो पैसे और पद का ऐसा ‘गंगा स्नान’ होता है कि मानो सारे पाप धुल गए। ‘चाहे जितनी भी संख्या में टूटकर आओ, बस मोदी को समर्थन दो’ यही भाजपा की नीति है। यह एक तरह की राक्षसी भूख है। लेकिन, अगर इन लोगों के हाथ में दिल्ली की सत्ता, ईडी और सीबीआई जैसी जांच एजेंसियां न होतीं, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की ‘चोटियां’ इनके हाथ में न होतीं, तो क्या आज यह नंगा नाच कर पाना मुमकिन था? जो खेल इन्होंने शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ खेला, वही हु-ब-हू तृणमूल के साथ दोहराया गया। कहा जा रहा है कि तृणमूल के आठ-दस सांसदों की पुरानी फाइलें उखाड़कर उन्हें डराया-धमकाया गया। लेकिन कल तक ममता दीदी के पीछे छिपकर दहाड़ने वाले ये लोग इतनी जल्दी घुटनों पर आ गए और थरथराने लगे, यह पश्चिम बंगाल के लड़ाकू मिजाज को कतई शोभा नहीं देता। ये तमाम दलबदलू भाजपा के सामने नतमस्तक हो गए और केंचुए की तरह रेंगने लगे। हद तो यह है कि इन लोगों को मोदी-शाह ने सीधे भाजपा में एंट्री देने से भी मना कर दिया; इन्हें एक कूड़ेदान जैसी पार्टी के हवाले कर दिया गया। इसलिए, तृणमूल से टूटे इन सांसदों की हालत पूंछ हिलाते आवारा कुत्तों जैसी हो गई है। ऊपर से इन पर अयोग्यता की तलवार अलग से लटक रही है। चाहे महाराष्ट्र हो या बंगाल, हर जगह भाजपा ने बेईमानों की फौज तैयार करने की यही तरकीब अपनाई है। पंजाब में भी उन्होंने ‘आप’ जैसी पार्टी के सांसदों को तोड़ा ही है। महाराष्ट्र, बंगाल और पंजाब ये वो राज्य हैं जो शूरवीरों और खुद्दार लोगों की धरती रहे हैं। लेकिन दिल्ली के इस ‘व्यापारी मंडल’ ने इन राज्यों के शौर्य और स्वाभिमान का मानो सुन्नत ही कर डाला है। अब इन राज्यों के सत्ताधीशों को अपने-अपने दफ्तरों और घरों के बाहर बाकायदा बोर्ड टांगकर लिख देना चाहिए, ‘सज्जनों! हमारे यहां स्वाभिमान का सुन्नत तसल्लीबख्श करके मिलेगा।’

अन्य समाचार