मुख्यपृष्ठस्तंभगिरगिट भी इतनी जल्दी रंग नहीं बदलता, सायोनी-चड्ढा!

गिरगिट भी इतनी जल्दी रंग नहीं बदलता, सायोनी-चड्ढा!

-कल तक मोदी सरकार पर बरसती थीं, आज पहली मुलाकात को बता रहीं ‘यादगार पल’

-सायोनी हों या राघव, भारतीय राजनीति में सवाल फिर वही है: विचारधारा बदली है, अंतरात्मा जागी है या सत्ता की दिशा देखकर कम्पास घूम गया है?

सामना संवाददाता / नई दिल्ली
राजनीति में कब कौन किसके करीब आ जाए, इसका अंदाजा शायद मौसम विभाग भी न लगा पाए। लेकिन टीएमसी की पूर्व तेज-तर्रार सांसद सायोनी घोष का राजनीतिक यू-टर्न इन दिनों खास चर्चा में है। जो सायोनी कुछ महीने पहले तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार पर संसद से लेकर चुनावी मंच तक तीखे प्रहार कर रही थीं, वही अब प्रधानमंत्री से पहली मुलाकात को ‘याद रखने वाला पल’ बता रही हैं।
सायोनी ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत का वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करते हुए लिखा, ‘माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के साथ मेरी पहली मुलाकात। एक यादगार पल!’ यह मुलाकात ऐसे समय हुई, जब टीएमसी से अलग हुए सांसदों का गुट एनसीपीआई के साथ जाकर एनडीए खेमे के करीब आ चुका है। हाल में इन बागी सांसदों ने एनडीए संसदीय दल की बैठक में भी हिस्सा लिया था। यही सायोनी घोष अप्रैल २०२६ के बंगाल चुनाव के दौरान भाजपा और केंद्रीय एजेंसियों पर मतदाताओं को डराने-धमकाने के आरोप लगा रही थीं और कह रही थीं कि बंगाल की जनता ममता बनर्जी के साथ है। चुनाव परिणाम के बाद भी उन्होंने ममता बनर्जी का बचाव करते हुए दावा किया था कि ‘हम हारे नहीं हैं, ममता बनर्जी को हराया गया है’ और भाजपा पर वोट चोरी तथा वोट लूटने के आरोप लगाए थे।
इतना ही नहीं, कभी संसद में मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों और महंगाई को लेकर हमलावर रहने वाली सायोनी भाजपा विरोधी टीएमसी की सबसे आक्रामक युवा आवाजों में गिनी जाती थीं। लेकिन जून में तस्वीर तेजी से बदली। टीएमसी के करीब २० सांसदों के बागी खेमे में शामिल होने के साथ उनका नाम भी सामने आया और इस गुट ने एनसीपीआई के साथ जाने का रास्ता चुना।
कल का कट्टर विरोधी, आज का संभावित सहयोगी
विचार बदले हैं, परिस्थितियां बदली हैं या सत्ता का पता बदलते ही राजनीतिक रंग भी बदल गया? सायोनी-चड्ढा के आलोचक इसलिए तंज कस रहे हैं, ‘गिरगिट भी शायद इतनी जल्दी रंग नहीं बदलता!’ दिलचस्प यह भी है कि दल बदलने के बाद सायोनी-चड्ढा को अपने ही संसदीय क्षेत्र से, अपने ही समर्थकों से विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए मोदी-सायोनी की यह मुस्कुराती तस्वीर केवल एक शिष्टाचार मुलाकात की तस्वीर नहीं है। यह बंगाल की बदलती राजनीति की ऐसी तस्वीर भी है जिसमें कल का कट्टर विरोधी आज संभावित सहयोगी है।
राघव चड्ढा भी उसी राह पर!
राघव चड्ढा की कहानी भी कुछ ऐसी ही दिखाई देती है। कभी आम आदमी पार्टी के सबसे चर्चित युवा चेहरों में रहे चड्ढा संसद और सार्वजनिक मंचों से मोदी सरकार तथा भाजपा पर तीखे हमले करते थे। लेकिन अप्रैल २०२६ में उन्होंने `आप’ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया और अपने पैâसले के पीछे आम आदमी पार्टी के कथित ‘टॉक्सिक वर्क एनवायरनमेंट’ को वजह बताया।अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा यहां तक पहुंच गई है कि भाजपा नेतृत्व उनसे प्रभावित है और आगामी मंत्रिमंडल विस्तार में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है।

अन्य समाचार